Sunday, 11 February 2024

संपादकीय विचार (Editorial Opinion)

केंद्र सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्ष में, इस बार 5 लोगों को भारतरत्न देने की घोषणा की हैं। केंद्र के इस घोषणा के बाद जहां विपक्ष सरकार पर राजनैतिक महत्वाकांक्षा का आरोप लगा रहा वहीं विपक्ष के कुछ लोग इसे दिल जीतने की बात बता रहें। कुछ ऐसे भी राजनीतिक पार्टियां हैं जो केंद्र सरकार को इस सम्मान के लिए अगली सूची दे रहें हैं। कुल मिलाकर विपक्ष एक बार फिर बीजेपी के इस फैसले पर आंतरिक रूप से बिखरती नज़र आ रही हैं। बात करते हैं बीजेपी के इस पासे की जो आगमी लोकसभा के मद्देनजर फेंकी गयी हैं।


एनडीए में सबसे मजबूत पार्टी होने के बाद भी बिहार में बीजेपी मजबूत नहीं है। उत्तरप्रदेश में बीजेपी अपने सबसे बेहतरीन दौर में है। इसके बावजूद भी राज्य में जातिगत समीकरण को साधने के लिए पार्टी विकल्प की तलाश में है। ऐसा माना जाता है, और आँकड़े भी बताते है कि दक्षिण में बीजेपी की स्थिति कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के तुलना में कमजोर है।

अब लोकसभा के गणित को समझें तो बिहार मे 40 ,यूपी में 80 और दक्षिण में कुल 132 सीटें आती है। दक्षिण के सीटों में सबसे ज्यादा सीट तमिलनाडु 39 कर्नाटक 28,आंध्र प्रदेश 25 और केरल से 20 सीटें हैं। यानि की लोकसभा के कुल 545 सीटों में 252 सीटें। सीटों के मायनों से एक ऐसा नंबर जहां बीजेपी अबकी बार 400 पार के स्लोगन को बखूबी से अंजाम दिया जा सकता है। अमित शाह की इंडिया टुडे को दिए उस साक्षात्कार का वो अंश जहां वो कहते है, "इतना ही जानते हो मुझको" एक बड़ी रणनीति का वो हिस्सा है। जिसका पार पाना इतना सरल नहीं है जितना विपक्ष दिखाने की कोशिश कर रहा है। वो दौर याद करिए जब सत्ता सड़के, बिजली, पानी, और स्थानीय दहशतगर्दों की गुलाम हुआ करती थी। आपको यह बताता चलूँ की आज भी सत्ता इन्ही की गुलाम है, सिर्फ स्वरूप बदल चुका है। अपने छोटे उम्र की कुछ नादानियों के अनुभव और अखबार के पन्नों पर छपे रोज की कहानियों के आधार पर इतना तो पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि वास्तविक मुद्दे, जो जनता से जुड़े हुए हैं उनपर राजनीति कभी नहीं हुई, उन पर सिर्फ ढोंग हुआ और शायद आगे भी ना हो।

खैर मुद्दे पर आते हैं। एक वक्त पर जब अन्य राजनैतिक पार्टी उत्तर दक्षिण, पूर्व पश्चिम खेल रही है। बीजेपी के निशाने पर भारत का वो हिस्सा था जहां लोकसभा की सीटें भले कम हो मगर हार या जीत का अंतर बहुत बड़ा होता है। पिछले दिनों जब विपक्ष कभी ना एक होने का नाटक कर रही थी, बीजेपी इन राज्यों में पार्टी को मजबूत कर रही थी। प्रधानमंत्री का दक्षिण दौरा सिर्फ दौरा नहीं था। आप खुद सोचो देश के इस भू भाग पर पिछले 10 सालों में प्रधानमंत्री के राजनीति का कितना सक्रिय हिस्सा रहा ? लेकिन 2024 के जनवरी में लगभग आधा महीना प्रधानमंत्री ने यहीं बिताया। इस दौरान वो कभी दक्षिण में करोड़ों की परियोजनाओं की घोषणा करते दिखे तो कभी समुद्र तटों पर टहलते दिखे। अयोध्या में होने वाले प्राणप्रतिष्ठा में मुख्य जजमान की भूमिका के लिए तमिलनाडु के मंदिरों पूजा पाठ में लीन रहे, तो कभी रोड शो के जरिए विपक्ष को अपने होने का भी आभास कराया। दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर जो गायें है, उसका कनेक्शन भी दक्षिण से था। प्रधानमंत्री के दक्षिण दौरे के दौरान ऐसे कई काल्पनिक घटनाएं भी घटी जो सिर्फ दक्षिण में होता है या फिर उसका दक्षिण से अटूट रिश्ता है। कुल मिलाकर बीजेपी ने ये साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा जिससे यह बोध न हो कि पार्टी दक्षिण की नहीं है। सबसे बड़ी बात कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष यहीं से सांसद भी है।

अब बातें बिहार की, राज्य में बीजेपी ने एक बार फिर सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली है। प्रदेश में पार्टी से दो दो उप मुख्यमंत्री है। ये दोनों एक ऐसे उप मुख्यमंत्री हैं जिन्हें मुख्यमंत्री नहीं पसंद है। फिर भी जदयू और बीजेपी ने अपने अपने महत्वाकांक्षा के लिए ,एक दूसरे के दरवाजे खोल दिए हैं । ये दरवाजा कब तक खुला रहेगा, इसको लेकर किसी भी तरह की भविष्यवाणी ठीक उसी प्रकार होगी,जिस प्रकार मुख्यमंत्री कुमार हमेशा गठबंधन बदलने से पहले कहते है कि अब हम यही रहेंगे।

राजनीति के विशेषज्ञ कई बार दावा कर चुकें है कि नीतीश जी की यह आख़िरी चाल थी,जो उन्होंने चल ली। अब वो सिर्फ़ एक मोहरा है। लेकिन मैं पूरी तरह से य़ह नहीं मानता। राज्य में मुख्यमंत्री कुमार की जरूरतें अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुयीं है। क्योंकि ऐसे किसी भी समीकरण की चर्चा फिलहाल तो नहीं दिख रहा है जिसमें बीजेपी और आरजेडी अकेले दम पर उस मैजिक नंबर को छु ले। जहां सत्ता की चाभी मिलती है। जातिवाद की राजनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा भारतीय संसद में अपने 40 पहलवानों को भेजता हैं और बीजेपी कभी नहीं चाहेगी कि राज्य से ज्यादा संख्या में उसके विरोधी पहलवान संसद पहुँचे। हालांकि लोकसभा के चुनावी सर्वे में बीजेपी को नंबर ज्यादा मिल रहे हैं। लेकिन बीजेपी किसी भी प्रस्थिति में विपक्षी पार्टियों रियायत नहीं देगी।

सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों के साथ लोकसभा की गणित बनाने और बिगाड़ने का दंभ भरने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में इस बार भी ऊंट बीजेपी के तरफ ही बैठती नज़र आ रही है लेकिन ओपिनियन पोल के रिज़ल्ट के अनुसार प्रदेश में मिल रही 72 सीटों से पार्टी खुश नहीं लग रहीं। उसे 72 से कहीं ज्यादा की तमन्ना है। ऐसे में अब देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि पार्टी गठबंधन के लिए क्या निर्णय लेती है। हालांकि पार्टी ने अपना पासा फेंक दिया है और नंबर भी गोटी लाल होने की संकेत कर रहीं हैं लेकिन राजनीति में छोटा वक्त एक लम्बा अन्तराल होता है।

महाराष्ट्र जो कि लोकसभा में सीटों के हिसाब से दूसरा बड़ा राज्य है यहां विपक्ष बराबर दिखाई दे रहीं हैं। लेकिन आंकड़ो में ज्यादा अंतर नहीं होने से कोई ख़ासा समीकरण नहीं दिख रहा।

अब गौर करने वाली बात प्रधानमंत्री द्वारा सिफारिश पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाने वाला देश की सर्वोच्च सम्मान के लिए 2024 में जिन लोगों का चयन किया गया है। उनकी राजनीतिक पृष्टभूमि है, जो वर्तमान राजनीति में वोटों को साधने का एक बढ़िया तरीका है। जहां कांग्रेस अपने परिवारवाद दिल्ली में वर्चस्व कायम रखने की परंपरा में पिछड़ गया। कहते है राजनीति में समय मायने रखता है और य़ह कहना गलत नहीं होगा कि बीजेपी ने सही समय पर सही हथौड़ा मारा है।

• कर्पूरी ठाकुर- पूर्व मुख्यमंत्री (बिहार), दलित नेता
• लालकृष्ण आडवाणी-पूर्व उपप्रधानमंत्री ,केंद्रीय मंत्री, बीजेपी और संघ के कद्दावर नेता जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन को राजनैतिक स्वरूप प्रदान किया।
• चौधरी चरण सिंह - पूर्व प्रधान मंत्री, उत्तरप्रदेश, जाट नेता
• श्री पीवी नरसिम्हा राव गारू-पूर्व प्रधानमंत्री, तेलुगु नियोगी ब्राह्मण, आंध्रप्रदेश
• डॉ. एमएस स्वामीनाथन- भारत में हरित क्रांति के जनक, तमिलनाडु

Sunday, 21 January 2024

कहानी राम मंदिर की, एक सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन की...

पिछले दिनों अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर राजनीतिक गहमागहमी काफ़ी ज्यादा बढ़ गई है। जहां एक तरफ समारोह को लेकर पूरा देश राममय है, वही दूसरे तरफ आमंत्रण और निमंत्रण को लेकर राजनीति हो रही है। जिन्हें आमंत्रण मिल रहा है, उनके पास न जाने के बहाने है। जिन्हें आमंत्रण नहीं मिल रहा उनके पास आने के बहाने है। मगर इस लड़ाई में कुछ लोग ऐसे भी है जिन्हें ना आमंत्रण से मतलब है और ना ही निमंत्रण से। उनका कहना है कि जब चीजें उनके पक्ष में होगी तब वो अयोध्या जाएंगे। ज्ञात हो की 22 जनवरी को अयोध्या में होने वाले प्राणप्रतिष्ठा को लेकर राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा लोगों को कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। आमंत्रित होने वाले लोगों में राजनेता, अभिनेता, सहीत अलग अलग क्षेत्रों के वीआईपी और आम लोग भी शामिल है।

ऐसा कहा जा रहा है कि करीब 500 साल बाद अयोध्या में बन रहा राम मंदिर, निकट भविष्य में हिंदुओं का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल बनेगी। देश में हिंदुओं की सबसे बड़ी आबादी है, ऐसे में हिंदुओं के लिए यह सबसे बड़े अवसरों में से एक है। वर्तमान में देश कि सबसे बड़े पार्टी और सत्तारूढ दल भारतीय जनता पार्टी के लिए अपनी महत्वाकांक्षा भुनाने का सबसे बेहतरीन अवसर है। पार्टी अपने स्थापना से ही इस कार्य में भी लगी हुई है और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए पार्टी ने हर संभव प्रयास किया है, और उसे सफलता मिली है। यही एक कारण है कि पार्टी के लिए आज भी यह एक ऐसा मुद्दा है जहां पार्टी किसी भी समझौते से खुद को अलग कर रही है। खैर ये मुद्दे अलग हैं। क्योंकि राजनैतिक महत्वाकांक्षा हर पार्टी की होती है। इसे किसी अन्य विषय से जोड़कर देखना किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं होगा।

आंदोलन की शुरुआत  

फिलहाल बात राजनीति के उस किस्से कि जिसका परिणाम है राम मंदिर का निर्माण। राम मंदिर मुद्दे पर बीजेपी की सबसे बड़ी जीत अपने विपक्ष पर ये है कि इस मुद्दे पर विपक्ष के एक जैसे सुर कभी नहीं रहे है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की कहानी कब शुरू हुई इसके कई पहलू है। लेकिन समझदारों ने इसे अलग-अलग खंडों में विभाजित कर इसे समझने वालों के लिए आसान कर दिया। आप कुछ और भी कह सकते हैं। शब्दों का क्या है? भाव एक होने से मतलब है। राम मंदिर आंदोलन को समझदारों ने 3 भागों में बांटा है। जिसकी शुरुआत मध्य से होती है। उससे पहले का हिस्सा और फिर बाद का किस्सा तो जोड़ा गया है। जिसके गवाह उसके साक्ष्य हैं। समय की मांग है और जनमत का विश्वास है। इस आंदोलन को जिन तीन भागों में बांटा गया है, उनमे एक महत्वपूर्ण किरदार है ताला। इसे ऐसे समझते है। विवादित स्थल पर ताला किसने और क्यों लगाया? ये कहानी का पहला हिस्सा है। जिसके कुछ भाग दूसरे हिस्से से भी लिए गए है। तीसरे हिस्से में विवादित स्थल को लेकर हुए आंदोलन, कोर्ट के फैसले के साथ साथ राम मंदिर का निर्माण है। दूसरे हिस्से की कहानी जो वास्तविक लगती है दरअसल वो पहले और तीसरे हिस्से का सार है। जिसमें उन सभी सवालों के जबाव है जो एक प्रश्नकर्ता के लिए जानना जरूरी है। संख्या में और तिथियों में कहें तो, पहला हिस्सा 1949 से लेकर 1985 तक है। जिसमें ताला लगाया जाता है और उसे खोला जाता है। उसके बाद 1986 से लेकर 1992 तक के किरदार है जो वास्तव में है। उसके बाद 1992 से 2019 तक की कहानी है जिसे परिस्थिति के अनुसार बुना गया। जिसका बुना जाना एक लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए जरूरी था।

22 जनवरी 2024 को 1885 (पहली बार यह मामला कोर्ट में पहुंची थी) को शुरू हुए उस आंदोलन की जीत पर औपचारिक मुहर लग जाएगी। इतिहास में अंकित किस्से की माने तो 1885 में पहली बार फैजाबाद की एक अदालत में महंत रघुबीर दास द्वारा अयोध्या उस बाबरी मस्जिद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के साथ उस आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसके संघर्ष ने कितनों ही किस्सों को जन्म दिया। लेकिन इतिहास के कुछ पन्ने ये मानते है कि आंदोलन कि असली शुरुआत 1949 में हुई थी। मामले को लेकर कहा जा रहा है कि विवादित स्थल पर पहले से ही ताला लगा था। लेकिन यहां सवाल है कि ताला लगाया किसने? एक सबसे जरूरी सवाल का कोई पुख्ता जवाब नहीं है। दरअसल हुआ ये कि विवादित स्थल पर जब मूर्ति रखी जा रही थी या मिली थी( अलग अलग मीडिया रिपोर्टों के आधार पर)। तो वहां पर अफरातफरी के माहौल को देखते हुए सुरक्षा के वास्ते ताला बंद कर दिया गया। जिसका कोई आदेश किसी ने नहीं दिया। इसकी पुष्टि करती है मीडिया रिपोर्ट्स जिसके मुताबिक 1985 में एक स्थानीय व्यक्ति उमेश पांडे द्वारा मुंसिफ सदर अदालत में ताला खोलने का मुदमा दायर किया। याचिका पर सुनवाई करते हुए मुंसिफ सदर ने तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट सभाजित शुक्ला से इस मामले में रिपोर्ट मांगी। न्यायालय के आदेश के बाद जब सिटी मजिस्ट्रेट ने 1949 से लेकर 1985 तक के अयोध्या से जुड़े सभी रिकॉर्ड की सघनता से जांच की तो पता चला की स्थल पर ताला किसने मारा इसकी कोई जानकारी कहीं नहीं है। लेकिन रिपोर्ट के बाद याचिककर्ता को एक मजबूत आधार मिल गया और उसने फिर से ताला खोलने के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल की। जिसे बहाना बनाकर टाल दिया गया लेकिन अब मुद्दा टलने वाला नहीं था।

धर्म संसद का गठन और रथ यात्रा

आंदोलन के दौरान अप्रैल 1984 में हुई विश्व हिंदू परिषद की धर्म संसद भी एक अहम पड़ाव था। जिसमें राम मंदिर को लेकर निर्णायक आंदोलन छेड़ने का फैसला किया गया था। जुलाई 1984 में अयोध्या में एक और बैठक हुई जिसमें महंत अवैद्यनाथ को श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का अध्यक्ष बनाया गया। यहां दो और फैसले हुए जिसमें भारतीय जनता पार्टी के हिस्से मुद्दे को लेकर राजनीतिक जिम्मेदारी और विश्व हिंदू परिषद को सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर इस आंदोलन का दायित्व मिला. दोनों संगठन अपने कार्य में लग गए। 1989 में जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ताला खोलने का आदेश दिया और विश्व हिन्दू परिसद ने ताला खोलने के साथ-साथ राम मंदिर की आधारशिला भी रख डाली।

इन दिनों आंदोलन का स्वरूप बदल चुका था। पाले बदल चुके थे। फिर आई राम मंदिर आंदोलन के इतिहास की तारीखों में सबसे महत्वपूर्ण 1990 और 1992 की वो तारीख, जब यह आंदोलन अपने दहलीज पर खड़ा था। ये बातें 25 सितंबर 1990 से पहले महज एक कल्पना थी। लेकिन 1990 में 25 सितंबर को सोमनाथ से शुरू हुई यह यात्रा इस आंदोलन की तस्वीर बदलने वाली थी। प्रतिदिन लगभग 300 किलोमीटर की यात्रा कई जनसभाओं को संबोधित करने के लक्ष्य के साथ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जन समर्थन के लिए यात्रा तो निकाल ली मगर उसके बाद जो हुआ उससे वो अनभिज्ञ रहे। गुजरात से निकली इस यात्रा को अगले 35 दिनों में अयोध्या पहुंचनी थी। इस यात्रा को भारी जन समर्थन मिला। देशभर से लाखों कार सेवक अयोध्या में मंदिर निर्माण की प्रतिज्ञा लिए अपने घर से बिना कुछ सोचे निकल चुके थे। जन समर्थन का इतना बड़ा सैलाब था कि सरकारें हिल गई। चंद लोगों की मुट्ठी भर की पार्टी ने देश के दो सबसे बड़े राज्यों के सरकारों की नींद छिन ली। नतीजा हुआ कि रथ यात्रा को बिहार में कानून के ओट में रोक दिया गया। जिससे 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचने की इच्छा पूरी नहीं हुई। इधर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अयोध्या में प्रवेश पर रोक लगा दी। बावजूद इसके रथ तो अयोध्या नहीं पहुंची लेकिन कारसेवक पहुंच गए। शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। विवादित स्थल के आस-पास भीड़ पर रोक लगाने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई। लेकिन मतवाले किसकी सुनते है। शहर में भारी संख्या में जवान तैनात थे। फिर भी देश के अलग-अलग हिस्सों से जुटे लाखों कार सेवकों ने ना सिर्फ अयोध्या मे प्रवेश किया बल्कि उस विवादित ढांचे पर भगवा झंडा लहरा दिया। यह आंदोलनकारी नेताओं और कार सेवकों की पहली जीत थी। लेकिन यह इतना आसान नहीं था जितना कि सुनने में लगता है। कारसेवकों ने ढांचे पर झंडा तो लहरा दिया मगर वहां अफरातफरी मच गई। जिसको लेकर पीएसी के जवानों ने कार सेवकों को खदेड़ने के लिए गोली चला दी। इसमें कई कार सेवकों की मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गोली तत्कालीन मुख्यमंत्री के आदेश पर चलाई गई थी। उसके बाद फिर क्या था, ये मामला इतना तूल पकड़ चुका था कि आंदोलन को अब साम दाम दंड भेद आदि के जरिए जारी रखा जाए और फिर से 6 दिसंबर 1992 को मंदिर निर्माण के लिए कार सेवा का आह्वान किया गया। इस बार लोगों की संख्या का कोई आंकड़ा नहीं था। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो लाखों कार सेवक बीजेपी, वीएचपी और बजरंग दल नेताओं के नेतृत्व में अयोध्या पहुंचे और विवादित ढ़ांचा गिरा दिया गया था।

विवादित ढ़ांचे की दास्तां

थोड़ा रुकते हैं। इसलिए क्योंकि कहानी के प्रवाह में हम आगे बढ़ गए। लेकिन पीछे इस कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा छूट गया है। बात है 1992 के उन दिनों की जब मस्जिद गिराया नहीं गया। उन दिनों एक अफवाह उड़ रही थी, कि विश्व हिन्दू परिषद द्वारा 9 जुलाई 1992 को विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण शुरू करेगी। बाद में यह साफ हो गया कि ये सिर्फ अफवाह तो नहीं थी। विश्व हिन्दू परिषद द्वारा मंदिर के लिए गुपचुप तरीके से 100 फुट लंबे और 80 फुट चौड़े एक चबूतरे का निर्माण किया जा रहा था। यह निर्माण 2.77 एकड़ के जमीन के उस टुकड़े पर हो रही थी जिसे सरकार को अधिग्रहित कर दिया गया है। इस बीच बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसका फायदा राम मंदिर को हो रहा था। केंद्र की मिली जुली कांग्रेस सरकार अपने मुद्दे में उलझी थी, राज्य की बीजेपी सरकार को भी मुद्दे चाहिए थे। 9 जुलाई 1992 को शुरू हुआ यह कारसेवा 26 जुलाई तक, देश में अलग अलग मंचों पर मुद्दों को उछाला जा रहा था। संसद, चौराहों और खास कर अयोध्या में चर्चा सिर्फ राम मंदिर। माहौल इतना गर्म हो गया कि ये तनाव दिन प्रति दिन बढ़ता गया। केंद्र ने शहर में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा रही थी लेकिन इसका असर राम मंदिर निर्माण कर रहे कारसेवकों पर नहीं हो हुआ। गति इतनी तीव्र थी की टकराव निश्चित था और मध्यस्था के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंदिर निर्माण कार्य में रोक का आदेश दिया। इस आदेश ने आंदोलन के लिए चिंगारी का काम किया। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद दोनों पक्षों के राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच टकराव जारी था। मामला हाईकोर्ट में था जिसपर 22 जुलाई कों सुनवाई होनी थी। कोर्ट ने फैसला दिया कि इन मुद्दों को खत्म करने के लिए खंडपीठ के गठन की पेशकश इस शर्त के साथ की सरकार निर्माण रोकेगी और 26 जुलाई को काफी मशक्त के बाद मंदिर निर्माण का कार्य रोका गया। लेकिन कारसेवा जारी रही। इसके चार महीने बाद उस विवादित मस्जिद को ढहा दी गई।

राजनीति का कानून

इतिहासकार कहते है, बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में हुआ था, लेकिन उसके कई सालों के बाद 1813 में हिन्दू संगठनों ने इस पर दावा किया। मेरे हिसाब से समय के इतने लंबे गैप के पीछे मुस्लिम आक्रांताओं का भारत पर दबदबा होना है। क्योंकि राम मंदिर से जुड़े मामले 1885 से अंग्रेजों के दस्तावेजों में भी मिलते है। ऐसे में अगर आप इस आंदोलन की समय सीमा को आंकेगें तो पता चलेगा की यह मामला 1528 से लेकर 2024 तक अपने कई किस्सों के संघर्ष में उत्थान और पतन के लम्हों को समेटे हुए है। इस दौरान यह 102 साल फैजाबाद जिला अदालत, 23 साल इलाहाबाद हाईकोर्ट और 9 साल सुप्रीम कोर्ट यानी की करीब 134 सालों तक लंबित रहा है। 200 सालों के लंबे इस मामले का 134 साल सिर्फ अदालतों में बीता और बाकी के दिन राजनीति में। मस्जिद  निर्माण के करीब 200 सालों बाद जब राम मंदिर का यह मुद्दा 1813 में पहली बार सामने आया। तब किसे मालूम था की यह चिंगारी भले ही आज कमजोर हो, लेकिन आने वाले समय में इसके ताप से सत्ता हिल जाएगी, सरकारें बनेगी और और टूट जाएगी। किसे मालूम था 500 सालों बाद जब यह मुद्दा देश के लोकतंत्र को एक नया नजरिया देगा। खैर शब्द भावना व्यक्त करने में पीछे रह जाती है। 1813 के बाद से ही राम मंदिर मुद्दा बन गया। यह धार्मिक आंदोलन कब सामाजिक और फिर राजनैतिक आंदोलन में बदल गई इसकी भनक किसी को नहीं लगा। 72 सालों के बाद 1885 में  पहली बार मामले को न्यायालय में गया। फैजाबाद की जिला अदालत में महंत रघुबर दास अर्जी लगाई। उनकी मांग थी कि जहां राम की पूजा की जा रही है, उस चबूतरे पर छतरी लगाया जाए और कोर्ट ने याचिका ठुकरा दिया। जिसके विरोध में दंगे होने लगे। वक्त गुजरता गया, आंदोलन अपनी पैठ बनाता गया। लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी थी। अयोध्या में दंगे भड़क रहे थे, या भड़काए जा रहे थे। इसका कोई हिसाब नहीं था। अंदर ही अंदर यह इतना मजबूत हो रहा था कि 1934 में दंगे में शामिल लोगों ने बाबरी मस्जिद का कुछ हिस्सा तोड़ दिया सरकार अंग्रेजों की परिणाम हुआ कि विवादित स्थल पर नमाज बंद कर दी गई। यह पहली जीत हो सकती थी, लेकिन परिस्थित ऐसे थे कि मामला थोड़ा ठंड हो गया, लेकिन यह सिर्फ दिखने और दिखाने के लिए था। जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि बाबरी मस्जिद में केंद्रीय गुंबद के नीचे हिंदुओं ने रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी। यह घटना 1949 की है। स्थल पर अफरातफ़री हो गई और किसी ने मुख्य दरवाजे पर ताले लगा दिए। इसके 7 दिन बाद फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी मस्जिद को विवादित भूमि घोषित कर दिया। अब यहां कुछ भी नहीं हो सकते थे। ना तो पूजा और ना ही नमाज। फिर क्या था 1950  हिंदू महासभा के वकील गोपाल विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दाखिल की। जिसमें रामलला की मूर्ति की पूजा का अधिकार मांगा गया। कोर्ट ने अर्जी पर तत्काल सुनवाई नहीं की। लेकिन इसके बाद नियमित अंतराल पर कोर्ट में कई याचिका दर्ज कराए गया। जिसमें 1959 में निर्मोही अखाड़े ने विवादित स्थल पर मालिकाना हक जाताना, 1961 में  सुन्नी वक्फ बोर्ड (सेंट्रल) द्वारा मस्जिद व आसपास की जमीन पर अपना हक जाताना आदि शामिल थे। 

अब एक तरफ आंदोलन चल रहा था और दूसरे तरफ अदालतों में सुनवाई। आंदोलनकर्ता अपने पक्ष में लोगों के जन समर्थन इक्कठा कर रहें थे । तभी 1986 फैजाबाद कोर्ट ने मुख्य दरवाजे का ताला खोलने का आदेश दिया और उसके एक साल बाद 1987  में पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दिया। मामला अब जिला अदालत में नहीं हाई कोर्ट में था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1989 में सुनवाई के दौरान इतना ही कहा की विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रहे। लेकिन आंदोलन अब बड़ा हो गया था। जिसके इरादे अब बड़े हो चुके थे। खैर 10 साल बाद यानी 2002 से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित ढांचे वाली जमीन के मालिकाना हक को लेकर दायर याचिकाओं पर फिर से सुनवाई शुरू की और 2010 में इस पर फैसला सुनाया। फैसले में  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बराबर बांट दिया। यह तीन जजों के फैसले में 2:1 की बहुमत का फैसला था। लेकिन राम भक्तों ने इतने के लिए यह लड़ाई नहीं ठानी थी। नतीजा हुआ किहाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। जिस पर  2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर  सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने के बाद 2018 में इस विवाद से जुड़ी सभी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई और 6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट में इस विवाद पर लगातार 40 दिन तक सुनवाई की गई। जिसके बाद 16 अक्टूबर 2019 को दोनों पक्षों  की दलीलें सुनने के बाद  सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

इसके बाद भी किस्से बाकीं है मगर ये दास्तां यहां खत्म हो गई थी। बाकी चीजें तो महज एक उत्सव है।

Wednesday, 3 January 2024

इलेक्टोरल बॉन्ड कितना हकीकत कितना फ़साना ?




मंगलवार 2 जनवरी 2024 को केंद्र सरकार ने राजनैतिक दलों को चंदा देने के लिए जारी होने वाले इलेक्टोरल बॉन्ड की 30वीं किश्त को मंजूरी दे दी। इसकी बिक्री 11जनवरी तक चलेगी। वित्त मंत्रालय के बयान के मुताबिक यह एसबीआई के 29 ब्रांच में बेचे जाएंगे। जिसे कोई भी नागरिक या कंपनी खरीदकर किसी भी पार्टी को चंदे के में दे सकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर को इस पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इसकी जरूरत क्या है? कोर्ट ने इससे संबंधित अन्य सभी जानकारी के लिए चुनाव आयोग से फंडिंग की जानकारी मांगी है

इस लेख में हम जानते है, आखिर क्या होता है? यह इलेक्टोरल बॉन्ड... 

इलेक्टोरल बॉन्ड को आसान भाषा में समझें तो यह एक चुनावी बॉन्ड है। यह एक तरह का प्रोमिसरी या बैंक नोट है। जिसे कोई भी आम नागरिक या कंपनी खरीद कर अपने पसंदीदा राजनैतिक पार्टी को डोनेट कर सकता है। लेकिन बॉन्ड का उपयोग सिर्फ वही पार्टी कर सकती है जिसे पिछले चुनाव में कम से कम 1% वोट हासिल हुआ है। इसे कोई भी नागरीक बैंक के निश्चित शाखा से खरीद कर गुमनाम तरीके से अपने पसंदीदा राजनैतिक दलों को दान कर सकता है. 

भारत सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी. उसके बाद फिर 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन इसे लागू कर दिया था. जिसके तहत भारतीय स्टेट बैंक राजनीतिक दलों को पैसा देने के लिए बॉन्ड जारी करता है. जिसे कोई आम नागरीक या कंपनी ख़रीद सकता है. ब़ॉन्ड खरीदने के लिए खरीदार के पास एक ऐसा बैंक खाता होना चाहिए, जिसकी केवाईसी की जानकारियां उपलब्ध हैं. गौरतलब है कि इलेक्टोरल बॉन्ड में भुगतानकर्ता का नाम नहीं होता है. इसलिए इसमें पैसे की श्रोत का प्रमाण निश्चित नहीं होता है. 


भारतीय स्टेट बैंक की निर्दिष्ट शाखाओं से 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, एक लाख रुपये, दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये में से किसी भी मूल्य के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे जा सकते हैं.जिस बॉन्ड्स की अवधि केवल 15 दिनों की होती है इस दौरान इसका इस्तेमाल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जा सकता हैं. यह जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के महीनों में 10 दिनों की अवधि के लिए ख़रीद के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं. लेकीन लोकसभा चुनाव के वर्ष में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि के दौरान भी इसे जारी किया जा सकता है.


कई बड़ी संस्थाओ ने इसे गलत बताया है

सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर कहा कि इसके जरिए काले धन को सफेद किया जा सकता है। ऐसे में इस अवसर का लाभ उठा कर विदेशी कंपनियां सरकार और राजनीति को प्रभावित कर सकते है। इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर चुनाव आयोग का पक्ष भी बॉन्ड और सरकार के साथ नहीं है। आयोग का कहना है कि इसमें चंदा देने वालों का नाम गुमनाम रखा जाता है। ऐसे में इस बात का पता नही लगाया जा सकता है, या यह कहे की इसका पता लगाना मुश्किल है कि राजनीतिक दल ने धारा (29बी) का उलंघन किया है या नहीं किया। विदेश से मिलने वाली चंदा की भी ठीक ठीक जानकारी नहीं हो पाएगी। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की तरह आरबीआई का भी मानना है कि यह ब्लैक मनी, मनी लॉन्डरिंग, आदि को बढ़ावा देगा. 


सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर 

2017 में भारत सरकार ने इस योजना की शुरुआत किया। सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कहा की यह कदम देश में राजनीतिक फ़ंडिंग की व्यवस्था को साफ़ कर देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ पिछले कुछ सालों सालों में ऐसे कई मामले आए जब इसको लेकर सवाल उठाया गया। इसको लेकर कहा गया कि इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए चंदा देने वाले की पहचान गुप्त रखी जाती इसलिए इससे काले धन की आमद को बढ़ावा मिल रहा है। सरकार पर यह आरोप लगा की सरकार को बड़े उद्योगपति से मिलने वाली चंदे को उजागर नहीं करना पड़े इसलिए कॉर्पोरेट घरानों को उनकी पहचान बताए बिना पैसे दान करने में मदद करने के लिए ऐसे व्यवस्था बनाई गई है. मामले को लकेर सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं भी दायर की गई हैं. पहली याचिका साल 2017 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और ग़ैर-लाभकारी संगठन कॉमन कॉज़ द्वारा संयुक्त रूप से दायर की गई जबकी दूसरी याचिका साल 2018 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने दायर की. फिलहाल याचिका पर सुनवाई कोर्ट में लंबित है। 


किस पार्टी को कितना मिला 

चुनाव निगरानी संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2016-17 और 2021-22 के बीच पांच वर्षों में कुल सात राष्ट्रीय दलों और 24 क्षेत्रीय दलों को इस इलेक्टोरल बॉण्ड से कुल 9,188 करोड़ रुपये चंदे के रूप में मिले. जिसमें सबसे ज्यादा चंदा भारतीय जनता पार्टी को मिला। जारी आँकड़ों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी को 5272 करोड़ रुपये यानी कुल इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए दिए गए चंदे का क़रीब 58 फ़ीसदी मिला. और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को  इलेक्टोरल बॉन्ड से क़रीब 952 करोड़ रुपये तो तृणमूल कांग्रेस को 767 करोड़ रुपये प्राप्त हुए. गौर करने बात है कि वित्त वर्ष 2017-18 और वित्त वर्ष 2021-22 के बीच राष्ट्रीय पार्टियों को इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिये मिलने वाले चंदे में करीब 743 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई. जबकि दौरान कॉर्पोरेट चंदा केवल 48 फ़ीसदी बढ़ा. इन पांच सालों में से वर्ष 2019-20 में सबसे ज़्यादा 3,439 करोड़ रुपये का चंदा इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिये आया. 2021-22 में क़रीब 2,664 करोड़ रुपये का चंदा मिला. दूसरी बातें जो गौर करने वाली है वो ये कि वर्ष 2019 -20 में लोकसभा के चुनाव हुए जबकि 2021-22 में कई राज्यों में विधान सभा के चुनाव हुए थे।

कुल मिलाकर देखें तो यह व्यवस्था एक ऐसी रणनीति का हिस्सा है जिस का सबसे अधिक फाइदा सत्ता में बैठी पार्टी को होता है,आकंडे भी यही कहते है। ऐसे में इस में कुछ बदलाव की जरूरत है। जिसके आधार पर इस व्यवस्था को और मजबूत बनाया जा सकता है। 

Thursday, 7 December 2023

जनादेश के बाद, किसे मिलेगा आदेश?

लोकसभा से पहले कुल 5 राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए। पांचों राज्यों में से एक में कांग्रेस, एक में क्षेत्रीय पार्टी ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट(ZPM) और बाकी के तीन राज्यों छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रचंड बहुमत के साथ जीत हुई है। चुनाव खत्म होने के बाद छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी की वापसी पर मुहर तो लग गया मगर मुख्यमंत्री कौन होगा इसके चर्चे जारी है। और यही हाल लगभग 18 सालों से एक ही मुख्यमंत्री चेहरे वाला राज्य मध्यप्रदेश का भी है। नेता से लेकर कार्यकर्ता तक और फिर जनता तक सबकों एक ही सवाल के जबाव की उत्सुकता है कि अगला मुख्यमंत्री कौन? 


मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर तो हाई-कमान का ही लगेगा, मगर चर्चे चारों तरफ जारी है। कोई कह रहा ये होंगे, तो किसी का मानना है कि वो नहीं हो सकते, सबके अपने मत है। इससे पहले बीजेपी ने कुल 21 संसदों को विधानसभा के चुनावी समर में उतारा जिसमें  12 चुनाव जीत गए, जबकि नौ सांसद अपनी सीट बचाने में नाकामयाब साबित हुए। अब जब पार्टी में मुख्यमंत्री पद के लिए दौड़  हो रही है उस रेस के बीच भारतीय जनता पार्टी के सभी ऐसे संसद जो पार्टी की सत्ता बचाओ अभियान में शामिल थे उनमें से विजयी विधायकों ने अपनी संसदी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। उनके इस्तीफ़े के बाद कहा जा रहा ही है कि बीजेपी ऐसी पार्टी है जिसके कार्यकर्ता  पद और उपाधियों की महत्वाकांक्षा से परे है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है, क्योंकि इसी पार्टी के करीब 25 से अधिक कार्यकर्ता  सिर्फ राजस्थान के है जिन्होंने पार्टी से सिर्फ टिकट की आकांक्षा थी उन्होंने टिकट ना मिलने के कारण पार्टी के खिलाफ़ ही खुद को खड़ा कर दिया। मतलब कि बीजेपी  सिर्फ पार्टी पार्टी पॉलिटिक्स तक सीमित तो नही हैं। 


एक दौर में पार्टी अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करती थी और आरोप लगाती रही है ये पारिवारिक पार्टी है, ये हाई कमान की पार्टी है,आदि आज वही शब्द पार्टी के पर्याय हो गए है। चाहे वो उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव हो, बिहार विधानसभा चुनाव हो, और हिन्दी पट्टी का कोई राज्य, दक्षिण में भी पार्टी की रणनीति रही है। और जहाँ क्षेत्रवाद जीता वहाँ पार्टी हार गई। आप मेरे मत से असहमत हो सकते है। लेकिन आँकड़े यही कहते है। उदाहरण के लिए अगर आप गौर करेंगे कि 2014 के बाद जो राजनैतिक परिवर्तन हुए है, उसमें सत्ता का केन्द्रीकरण सिर्फ एक केंद्र है तक सीमित रह गया। जो उससे पहले नही थीं। पहले भी सरकारें बनती थी, बिगड़ती थी लेकिन कारक कई होते थे। पहले की राजनीति का परिणाम विकेंद्रीकरण पर निर्भर होता था। जो आज बदल गई है। इससे 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव से जोड़ कर देखें तो। राज्य में जनता ने पार्टी को बहुतमत से काफ़ी बड़ी सँख्या में जनादेश दिया। कुल 430 सीटों में 325 सीटें जीतकर भी विधायक दल का नेता यानी की मुख्यमंत्री बना एक संसद। यहाँ तक की राज्य में उपमुख्यमंत्री जो संवैधानिक तौर पर कोई पद नही है लेकिन वो भी एक संसद को मिला। क्योंकि सिर्फ सत्ता नहीं चाहिए।  


अब जब ऐसे में हम क्षेत्रीय सत्ता की बात करते है तो ऐसे प्रस्थिति में जब सत्ता के विकेंद्रीकरण से ज्यादा प्रभावी उसका केन्द्रीकरण हो जाय तो फैसले भले ही लोकतांत्रिक लगे मगर होते नही है। जिसका हालिया उदाहरण तीन राज्यों के चुनाव परिणाम है। जहाँ सब कुछ निर्णय होने के बाद भी मुख्यमंत्री के नाम पर फैसले का इंतजार किया जा रहा। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो राजस्थान, छत्तीसगढ़, और मध्यप्रदेश तीनों राज्यों को मिला दे तो कुल, लगभग 15 से 16 नाम मुख्यमंत्री लिस्ट में है। इसमें पिछले मुख्यमंत्रियों समेत कुछ ऐसे नाम भी जो मीडिया में अचानक आ गए है। इनमें कोई  कोई एंटी-इनकम्बेंसी फ़ैक्टर के चलते चर्चा में है, तो कोई ओबीसी, दलित या आदिवासी समुदाय से आता है जो ना सिर्फ इस चुनाव के लिए बेहतर विकल्प है आगामी लोकसभा के लिए भी लाभदायक है। बाकी कुछ लोग ऐसे भी जिसकी पार्टी में पहुँच उपर तक है या भी विधायकों का एक बड़ा हिस्सा उनके पक्ष में है। लेकिन सभी के किस्मत का फैसला हाई कमान के हाथों में है। जो अगले कुछ दिनों के भीतर साफ हो जाएंगे।

Tuesday, 5 December 2023

कौन कितना गरीब ?

  


पिछले दिनों भारत को लेकर ऑक्सफैम ने  एक रिपोर्ट छापी "सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट: द इंडिया स्टोरी" ,जिसके आँकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के उस पन्ने को दिखाती जिसके एक पृष्ट पर कारक है तो दूसरे पृष्ट पर कर्ता। लेकिन ताज्जुब की बात है कि यहाँ कौन कहाँ है? और कैसे है? इसके कोई एक आँकड़े नहीं है जिस के आधार पर कुछ भी मान लिया जाय या फिर ये कहा जाय की विकास कि जरूरत किसे है। खैर इस विषय पर आगे बात करेंगे, फिलहाल रिपोर्ट में छपे आंकड़ों की जिसके कारण मेरे मन में इस लेख का शीर्षक आया, कौन कितना गरीब? 

 

भारत विविधताओं का देश ना सिर्फ भौगोलिक, सामाजिक, और साँस्कृतिक रूप से है बल्कि यह विविधता आर्थिक रूप से भी है। और अगर तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाय तो आर्थिक विविधता कहीं ज्यादा ही है। आप यह कहते सकते हो है कि मैं जिस समाज से आता हूँ, जिस परिवेश से आता हूँ, जैसा खान-पान है, पहनावा है, उसमें यह है और यह नहीं। लेकिन आप ये नहीं कह सकते हैं मेरी जरूरतें और आपकी कुछ जरूरतें ऐसी नहीं जो जो आर्थिक तंगी का शिकार ना हो। सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट रिपोर्ट यही कहता है। उदाहरण के लिए देखें तो हम उस समाज में है जहाँ खुले मंचों से यह कहा जाता है कि लिंग भेद कानून जुर्म है लेकिन इस जुर्म से बेगुनाह कितने लोग है? प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि पुरुष श्रमिकों द्वारा अर्जित प्रति 1 रुपए के मामले में महिला श्रमिकों को केवल 63 पैसे मिलते हैं। ये सिर्फ आर्थिक असमानता नहीं है। बल्कि यह हमारी धारणा है कि महिलायें उन कामों में बेहतर नहीं है जो पुरुषों के लिए बाँटे गए है। लेकिन इसके विपरीत जब ऐसे काम जिन्हे महिलाओं के लिए बाँट दिया गया है वो अगर कोई पुरुष करता है तो उसे सामान्य मजदूरी से दो गुणा ,चार गुणा ज्यादा मजदूरी मिलती है।


इसके साथ साथ सामाजिक-आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति वाले लोगों की तुलना में वर्ष 2018 और 2019 में  अनुसूचित जाति और ग्रामीण मज़दूरों की हिस्सेदारी क्रमशः 55% और 50% ही रही है। जिसके संकेत और जमीनी स्थिति हालत बयां करने को काफ़ी है। दरअसल हमारे द्वारा ही बनाई गई ये विविधता हमे बार बार लज्जित भी करती है और उलझाती भी है। और यह विविधता हमने सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित  भी नहीं रखी है। जिसके परिणाम है कि वैश्विक दौर में आज हम जहाँ है, वहाँ हमे बहुत पहले होना चाहिए था। 


रिपोर्ट के  अनुसार, देश कि अर्थव्यवस्था में सिर्फ सबसे अमीर लोगों को प्राथमिकता दिये जाने के कारण देश में हाशिये पर रहने वाले समुदाय जैसे- दलित, आदिवासी, मुस्लिम, महिलाएँ और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक पीड़ित हैं। इसमें नया नाम सवर्णों का भी है। जिसके बारे में आमतौर पर यह धारणा है कि ये आर्थिक रूप से सशक्त है, सक्षम है। लेकिन जमीनी स्थिति पूर्ण रूप से ऐसी नहीं है। कागजी और जमीनी आँकड़ों में काफ़ी अंतर है। ये ना तो ज्यादा अमीर है ना ही ज्यादा गरीब। जिसका नतीजा है कि अर्थव्यवस्था में होने वाली छोटी से छोटी परिवर्तन भी इनपर बड़ा इम्पैक्ट डालती है। 

ऐसे ही आँकड़े है ऑक्सफैम इंडिया के जो कहती है भारत में अमीरों की तुलना में गरीब असमान रूप से उच्च करों का भुगतान कर रहे हैं और आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं पर अधिक खर्च कर रहे हैं।आईएमएफ ने अनुमान लगाया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था 2027 तक जापान और जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी और  2047 तक भारत एक विकसित अर्थव्यवस्था वाला राष्ट के श्रेणी में आ जाएगा। मगर  विशेषज्ञों की माने तो तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को  6.5% की वृद्धि की आवश्यकता होगी और दूसरे स्थान के लिए  8% -9% की वृद्धि की आवश्यकता होगी। और इसकी वर्तमान अर्थव्यवस्था 3.63 ट्रिलियन डॉलर है। और वर्ष 2023-24 के लिये अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि 6.5% है। यानि की हम तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बेहद करीब है। 


इसके एक और पहलू को देखिए ऑक्सफैम के रिपोर्ट में कहा गया कि नवंबर 2022 तक महामारी शुरू होने के बाद से भारत में अरबपतियों  के संपत्ति में 121%  यानी करीब 3,608 करोड़ रुपए प्रति दिन की ग्रोथ हुई। लेकिन 2021-22 के गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) में करीब 14.83 लाख करोड़ रुपए का लगभग 64% भारत के उस आबादी से आया जिसकी हिस्सेदारी आधे से भी कम है। और  GST का सिर्फ 3% ही शीर्ष 10 % से आया। मतलब आप यह कह  सकते है कि भारत कि सबसे अमीर 1% आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा है, जबकि एक-साथ वर्ष 2012 और 2021 के दौरान नीचे की आधी आबादी की संपत्ति में हिस्सेदारी मात्र 3% थी। यानी की कौन कितना गरीब है आप इसका अनुमान इस आँकड़े से लगा सकते है। 

आसानी से समझने के लिए देखें तो 2022 में अरबपतियों की कुल संख्या बढ़कर 166 हो गई जबकी 2020 में यह आँकड़े 102 था। भारत के 100 सबसे अमीर लोगों की संयुक्त संपत्ति 660 अरब डॉलर है। यानी की 18 महीने से ज्यादा के पूरे केंद्रीय बजट को फंड  दिए जाने वाली राशि के बराबर। 


मतलब साफ है, कि कौन कितना गरीब है? और क्यों है? इसके कई किस्से है। मगर एक बात है कि जो जीतना अमीर है वो उतना ही अमीर होता चला जा रहा है, और जो जितना गरीब है वो उतना ही गरीब। लेकिन विकास हो रहा है। 

Saturday, 2 December 2023

Animal Review



फिल्म;  एनिमल

कलाकार;  रणबीर कपूर , रश्मिका मंदाना , बॉबी देओल, सुरेश ओबेरॉय , शक्ति कपूर और अनिल कपूर

लेखक; संदीप रेड्डी वंगा , प्रणय रेड्डी वंगा और सौरभ गुप्ता

निर्देशक संदीप रेड्डी वंगा

निर्माता; भूषण कुमार , मुराद खेतानी , कृष्ण कुमार और प्रणय रेड्डी वंगा

रेटिंग;   2.3 /5  

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अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो, नए दौर का सिनेमा किस्सों का नहीं है। किरदारों का है, टेकनोलॉजी का है, घिसी पिटी कहानी का है, और अंत में प्रमोशन का है। जिसके सहारे बार बार यह साबित किया जाता है कि ये नही देखा तो क्या देखा? और पूरे पैसे वसुल के नाम पर अंत में मिलता है पॉपकॉर्न वो भी बाजार के तुलना में तिगूने- चौगूने कीमतों पर। जिसका नतिजा है कि आज बढ़ियां सिनेमा और बेहतर दर्शकों दोनों एक दुसरे को ढुंढते फिर रहें। खैर ये तो हुई सीनेमा की बात जिसके कई पहलु है,और किसी एक के आधार पर दुसरे की तुलना करना सही नही होगा।


पारिवारिक ड्रामा पर आधीरत एक्शन थ्रिलर फिल्म  एनिमल अपने दर्शकों को पुरे 3 घंटे यह सोचने पर मजबुर करता है कि सिनेमा देखना इतना भी दुष्कर नहीं होना चाहिए। अगर आप फिल्म यूं ही देख लेते है तो इस फिल्म को देखने की कई वजहें  हैं लेकिन अगर फिल्म देखने का कोई खास मकसद है तो रूक जाएं। यह आपके समय और आर्थीक सेहत के लिए फाय़देमंद होगी। 


एनिमल की कहानी एक ऐसे लड़के के बारे में है जो अपने पिता के प्रेम का भूखा है, जो प्रेम उसे एनिमल बना देता है। जैसा कि आज के अधिकांश  फिल्में बताती है रियलिज़्म नाम की कोई चीज नहीं होती यह फिल्म उसी पटकथा को बार बार साबित करती है। बचपन से ही पिता के वक्त और प्यार को तरसता उस लड़के की कोशिस है कि वो अपने पिता को बेटे के प्रेम की वो कमी नहीं होने देगा जिसकी कमी उसने बार बार महसूस किया है। अपने प्यार को साबित करने के लिए वो हिंसा, सनकी प्रेम, स्त्रीविरोध, और महिमामंडन आदि करता है। इस फिल्म की मूल कहानी है। 


एक्टर्स ने शानदार एक्टिंग की है। निर्देशक ने शानदार निर्देशन किया है, और म्यूजिक का तड़का तो है ही। इसके साथ साथ फिल्म आपको उन किरदारों से भी जोड़ती है जो जिसे आपने एक लंबे स्क्रीनटाइम में देखा, लेकिन इस फिल्म में उन्हे ज्यादा वक्त नहीं मिला। फिर भी उनका अभिनय आपको खिचती है। रणबीर कपूर को छोड़ दे तो बमुश्किल उनके दो-तीन सीन्स के आधार पर ही आपको यह तय करनी है कि उन्होंने अच्छी एक्टिंग की है। रही बात रणबीर कपूर कि तो उन्होंने खुद को अलग तरीके से पेश किया है। जिसको लेकर आपको ज्यादा सोचना नहीं पड़ेगा क्योंकि उनके अभिनय की एक झलक फिल्म संजु में देखी जा चुकी है। बॉबी देवल को लेकर जो उम्मीद फिल्म के टेलर ने जगाई थी उसके अनुसार  फिल्म में उनका स्क्रीनटाइम दर्शकों को निराश जरूर करता है लेकिन उनके अभिनय के उन्हे पूरे अंक मिलते है। रही बात कहानी की तो संदीप रेड्डी वांगा को जो दिखाना था, जो कहना था, या यह कहे कि जिस तरह का वार्तालाप हम देखते है, करते है, और सुनते है, उसे बड़े पर्दे पर रख दिया गया है। ऐसे में सिर्फ मनोरजन कों ध्यान में रखते हुए यह फिल्म आपके तनाव को कम जरूर करता है लेकिन कहानी खत्म होते होते आपको यह निर्णय लेने का का अच्छा खासा समय भी दे रहा है जब आप यह सोचे कि कहानी के अगले भाग में क्या हुआ? 



फिल्म 1 दिसम्बर को बड़े पर्दे पर रिलीज हुई है, और जल्द ही यह ओटीटी पर आएगी। बड़े पर्दे पर फिल्म देखने के लिए आपको नजदीकी सिनेमाघरों में जाना होगा मगर ओटीटी के लिए आपको अभी इंतजार करना पड़ेगा। तब तक फिल्म का ट्रेलर देखने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक का सहारा ले सकते है।  

      https://www.youtube.com/watch?v=8FkLRUJj-o0


Saturday, 4 November 2023

बदले या बदलाव की राजनीति ?




केंद्र और राज्य सरकार की मनमानी के बीच कोर्ट भी नहीं आ सका, और बिहार में आखिरकार जातिगत जनगणना सम्पन्न हो गई। धर्मनिरपेक्ष और अलग अलग संप्रदाय, जाति को समान अवसर देने वाला देश ने आधिकारिक रूप से एक बार फिर से कागज पर जातिगत विभाजन देखा और बिहार देश का पहला राज्य बना जहाँ न सिर्फ जातिगत गणना सम्पन्न हुई अपितु परिणाम भी सार्वजनिक किए गए। परिणाम के बाद देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी और वर्तमान में अपनी जमीं टटोल रही कांग्रेस ने मौका देखा और आगामी चुनाव को देखते हुए, अपने तरफ से घोषणा कर दी कि अगर पार्टी सत्ता में आती है,तो राज्य में जातिगत जनगणना कारवाई जाएगी। विशेषज्ञों की माने तो पार्टी की यह घोषणा सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है।और हो भी क्यों जब पार्टी की पहचान राष्टीय स्तर तक है, फिर चीजें सिर्फ राजकीय स्तर तक क्यों ? हालाँकि यह भूलना नहीं चाहिए कि पार्टी की राष्टीय स्तर तक सीमित रह जाने के पीछे इसी रणनीति का दुष्परिणाम है। जिसका नतीजा है कि पार्टी आज अपनी जमीं तलाश रही है और क्षेत्रीय सत्ता से संतुष्ट होने को विवस है, लेकिन राहें यहाँ भी आसान नहीं है। क्योंकि बीजेपी कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के लिए कर रही प्रयासों में ढील देने के मूड में अभी तो नहीं दिख रहा। मगर बीजेपी की क्षेत्रीय स्थिति भी ठीक नहीं है। वर्तमान में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी की पहुँच अब राज्यों में समिति होती जा रही है। पिछले चुनाव में उसे कर्नाटक, हिमाचल जैसे राज्यों में मुँह की खानी पड़ी। हालाँकि गुजरात में उसे ऐतिहासिक जीत मिली। मुख्यमंत्री भूपेन्द्र भाई पटेल ने वर्तमान प्रधानमंत्री और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री के सभी रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। अन्य छोटी राज्यों में पार्टी गठबंधन को जीत मिली। पार्टी के पास जनता को रिझाने के लिए सिवाय राष्ट्रीय नेतृत्व का कोई विकल्प मौजूद नहीं। हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी को कर्नाटक में इसी बात का मलाल रह गया कि उसे जनता ने मौका नहीं दिया । कांग्रेस के पास अब खोने के लिए कुछ नहीं है, और पार्टी के पास अब सिर्फ एक विकल्प मौजूद है वो है क्षेत्रीय पहुँच। जिसके लिए पार्टी कोशिश कर रही है। राहुल गाँधी अपने छवि को बदलने का प्रयास कर रहे है, जिसका परिणाम उन्हे आने वाले चुनाव में दिखेगा। कुछ राज्यों में चुनाव होने वाले है। ये चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के साथ साथ उन क्षेत्रीय पार्टीयों के भी महत्वपूर्ण है जिनकी महत्वाकांक्षा सिर्फ राज्य तक समिति रह जाना नहीं है। पार्टियां अपने हिसाब से अखारे तैयार जरूर कर रही है, मगर मतदान से पहले ही पार्टियों में दरार हो जाना इस बात के संकेत है, कि जनता क्या चाहती है इसका परिणाम तो चुनाव के बाद आएगा लेकिन कार्यकर्ता की पसंद और चाहत अलग है। जो भविष्य की महत्वाकांक्षा को सहेजे खामोशी से उन फैसलों को स्वीकार कर रही है जो फिलहाल उनके हित में तो नहीं दिख रहा। रात के दो बजे पार्टी कार्यालय के बाहर रात बिताने को मजबूर कार्यकर्ता हो, टिकट नहीं मिलने पर पार्टी का भरोसा नहीं रख पाने वाले जनता से उम्मीद लगा रहे रहे है कि जनता उन पर विश्वास करें, ऐसी विचार रखने वाले नेता हो, या फिर राजनीति समझ से दूर रहने वाली आम जनता हो, इंतजार करती है चुनाव के उस तारीख का जब सत्ता बदल जाएगा। लेकिन इस बदलाव का नतीजा सिर्फ़ कागजी होता है। राजनीति महत्वाकांक्षा का पर्याय बन गया है। सत्ता महज एक बदले की वो तस्वीर बन गई है, जहाँ देखने का जरिया जो भी हो मगर दिखाई सिर्फ वो देता है जो हम नहीं देखना चाहते है। आसान भाषा में कहे तो जिस मंहगाई को आधार मानकर केंद्र की वर्तमान सरकार ने सत्ता पाई आज वो भी इसी से जूझ रही है। मुफ़्त की रेवड़ी के खिलाफ़ रहने वाली पार्टी के घोषणा पत्र मुफ़्त में चीजें देने के वादों से भरे पड़े है। ऐसे परिस्थित में जनता को विकल्प चाहिए जो उसके पास फिलहाल नहीं है। उसकी हालत तो तरबूज और चाकू वाली हो गई है, जहाँ कटना सिर्फ जनता का है। चाहे सरकार किसी की भी हो। लोगों की परेशानी जस की तस बनी रहती है। आज सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विकास की परिभाषा बदल चुकी है। विकास के ढोल इस तरीके से पिटी जाती है जैसे कि एक एहसान किया जा रहा हो। पिछले दिनों एक मंच पर एक गठबंधन की दो पार्टियां आपस में क्रेडिट के लिए लड़ रही थी। एक आरोप था हम है इसलिए दूसरे का कहना था जब कार्य संयुक्त कार्यकाल में हुआ है तो बातें भी संयुक्त ही होनी चाहिए। मेरे हिसाब से खुले मंचों से ऐसी बातों का होना सिर्फ और सिर्फ ढकोसला है। क्योंकि कुर्सी इन लालची लोगों को मालूम है, जनता को कैसे लुभाना है? और किस तरीके से उन मुद्दों से भटकाना जहाँ जनता इनकी गिरेबान न पकड़ सके। बाकी काम तो चुनावी जुमले कर ही देते है। और मीडिया बस टीआरपी में उलझी रहती है।


राजनीति के इन खिलाड़ियों को सब मालूम है, मगर ये भूल जाते हैं कि "ये पब्लिक है, ये सब जानती है।" शयद यही वजह है कि दिखने और दिखाने के खेल में ये जनता वो भी देखती है जिसे ना दिखाने के लिए ये सब कुछ करते है। आज जब मैं यह लिख रहा हूँ उसके पिछले  दिनों आईआईटी बीएचयू के परिसर में कुछ छात्रों मे एक छात्रा के साथ जबरदस्ती किया। पिस्टल के सहारे की गई हरकते बताती है कि कानून का हाथ भले ही लंबे  हो मगर उसका दायरा समिति हो गया है। जिसे लांघने की योग्ता सिर्फ इतनी है कि किसी राजनेता या उसकी पार्टी  को आपने आर्थिक सहयोग किया हो या फिर आप राजनीतिक रूप से सबल हो। और अगर आर्थिक सबल है फिर आपका गुनाह, बेगुनाही में आसानी से परिवर्तित हो जाती है। ये महज एक कहनी नहीं है, मीडिया की खबरें इसके उदाहरण से भरे है। बस आपको वो देखनी है जो मीडिया नहीं चाहती कि आप देखें। 


कुल मिलाकर देखें तो आज की राजनीति बदलाव की नहीं बदले की है। जहाँ विचारधारा, सिद्धांत आदि के कोई मायने नहीं, मकसद सिर्फ और सिर्फ कुर्सी से है। जिसके परिणाम के लिए भविष्य इंतजार कर रही है। 

Sunday, 4 June 2023

ट्रेन हादसों की कहानी...




पिछली बार आप ने ट्रेन से सफ़र कब किया था? क्या आपको याद है, आपके किसी रिश्तेदार ने कब ट्रेन से यात्रा की थी? या फिर कोई ऐसा वाक्या जो ट्रेन यात्रा से जुड़ी हो? बहुत से होंगे। हम अक्सर यादों को सहेज कर रखने की कोशिश करते हैं। क्योंकि यादें ही है जो हमे किसी की अनुपस्थिति में भी उसका स्मरण कराती है। लेकिन कुछ याद ऐसे भी होते हैं जो हमेशा के हमारे स्मृति पटल पर छप जाते हैं। इसमे से कुछ ऐसे होते है जिन्हें हम जीवन भर के याद रखना चाहते हैं तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम कभी याद करना चाहते। लेकिन उसकी यादें हमेशा के लिए रह जाती है। 

पिछले दिनों उड़ीसा के बालासोर में हुयी रेल दुर्घटना भी ऐसा ही है। इस भयंकर दुर्घटना ने लोगों से उनकी जिंदगी छीन ली। कुछ ही क्षण पहले मंजिल पर पहुँचने की, लोगों की उमंगता मातम में बदल गयी। घर पहुंचने की बैचेनी, अपने प्रियजनों को देखने की लालसा , बेटे से मिलने की माँ की बेबसी आदि कभी ना ख़त्म होने वाली इंतजार में बदल गयी। कई महीनों के संदेशों की पोटरी बाँध कर अपने घरों की ओर निकले लोग खुद संदेश बन कर घर पहुंच रहे हैं। घर की उम्मीदों और जिम्मेदारियों की गठरियाँ खुद एक गठरी बन गयी। जो बच गए उनकी दूसरी जिंदगी की शुरुआत मौत, लोगों की चीख़ -चीत्कार ,अफरातफरी की शोर के बीच ख़ुद के साथ हुए इस अद्भुत चमत्कार पर यकीन करते हुए अपने किस्मत का धन्यवाद रही थी। तो वही कुछ लोगों के पास अपने किस्मत को दोष देने का वक्त भी नहीं बचा था। और निराश ,हताश और मजबूर परिजन दही शक्कर को कोस रहे थे। इसके सिवाय उनके पास कुछ करने को था भी नहीं।


ऐसा नहीं था कि इस प्रकार की घटना पहली बार हुयी है बल्की ऐसी अनेकों दुर्घटनाएं पहले कई बार घट चुकी है। लेकिन हमने कुछ नहीं सीखा। इन घटनाओं से हमने सिर्फ़ लाशों की शक्ल में अपने फायदे को तलाशा है। जिसके पहचान के साथ अपनी रोटियाँ सेंकने की पूरी कोशिश की है। बड़े -छोटे मंचों से दुर्घटना के जिम्मेवार के साथ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की ओट में इस बात का खासा ध्यान रखा जाता है कि टीवी चैनलों और अखबारों में फोटो अच्छी आनी चाहिए। राजनैतिक फायदा के किसी भी नुकसान को बर्दाश्त किया जा सकता है। मामलें के प्रति सरकार की उदासीनता इस बात से लगाया जा सकता है कि घटनाएं के 2 दिन बाद भी बिना किसी देरी किए ट्विटर ट्विटर खेल रही है। घायलों को अस्पताल ले जाने वाली गाड़ी एक बार फ़िर से दुर्घटनाग्रस्त हो जा रही है। विपक्ष को सरकार की इस्तीफे के अलावे और कुछ नहीं चाहिए। दुर्घटनाग्रस्त हुए लोगों और उनके परिजनों से मिलने क़वायद तो पूरी हो चुकी है लेकिन अभी सरकार की अंतिम जवाबदेही बची हुयी है। जो मुआवजे की घोषणा कर अपना पल्ला झाड़ लेगी। क्योंकि ऐसा ही होता आया है। जिनकी जाने गयी, जिन्होंने अपने परिजनों को खोया, जो अब शारीरिक रूप से विकलांग हो गए उनकी गलती क्या थी इसका जबाब किसी पास नहीं। 


सरकार और पुलिस अभी भी उन मामलों की जाँच ही कर रही है जिसके वज़ह से यह घटनाएं घटी। सवाल य़ह उठता है कि क्या य़ह इतना मुश्किल है? या सरकार चाहती ही नहीं है कि इसका निवारण जल्दी से हो? क्योंकि पिछले कुछ घटनाओं में कारवाई की रफ़्तार सवालों के घेरे में पहले से है। जानकारी के लिए अभी जब मैं य़ह लेख लिख रहा हूँ तो रेलवे मंत्रालय द्वारा इसकी जाँच सीबीआई को सौंप दी गई है। अब देखना होगा कि मामले के जाँच में क्या परीणाम निकलते है। 


 गौरतलब है कि भारतीय रेलवे का राष्ट्रीयकरण 1951 में किया गया था जो वर्तमान में एशिया का दूसरा सबसे बड़ा तथा विश्व का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। लेकिन इसके साथ-साथ यह दुर्घटना में भी लगभग नंबर वन पर ही है। अभी तक भारतीय रेल के इतिहास में सबसे खतरनाक दुर्घटना 1981 में हुई थी जब एक यात्री ट्रेन पुल को पार करते समय पटरी से उतर गई थी। यह घटना बिहार में हुई थी जब ट्रेन की कोच बागमती नदी में डूब गईं। उस हादसे में 800 यात्रियों की मौत हो गई। दुःख की बात यह है कि कई पीड़ितों की लाश आज भी नहीं मिली। इसके बाद समय अन्तराल  पर 1980 से 2002 तक लगभग हर साल औसतन 475 ट्रेन के पटरी से उतर जा रही थी। जिसके पीछे संसाधन की कमी का बहाना था। बाद में फ़िर जिसमें काफी बदलवा हुयी और रेल सुरक्षा में सुधार हुआ है वर्तमान में गंभीर ट्रेन दुर्घटनाओं की कुल संख्या पिछले दो दशक में 300 से घटकर 22 हो गई है। रेलवे की रिपोर्ट के अनुसार 2017 तक हर साल लगभग 100 से अधिक यात्री ट्रेन दुर्घटना में मारे जाते थे। 

भारतीय रेलवे ख़ुद के लिए आधुनिक संसाधन संपन्न रेलवे के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन आंकड़ों से य़ह मेल नहीं खाता। क्योंकि सुधार के दावे और अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने के वाबजूद भी रेलवे दुर्घटनाएं रोकने में सफल नहीं हो पा रही। पिछले आंकड़ों को छोड़ दे और बालासोर के आंकड़ें ही चौकाने वाले है। अधिकारिक रूप से जारी आंकड़ों के अनुसार अभी तक इस हादसे में करीब 288* लोग मारे गए है जबकि 1116* लोग गम्भीर रूप से घायल है।

लेकिन सबसे गौर करने वाली बात यह है कि आंकड़े अधिकारिक है।


ट्रेन हादसों को कैसे रोका जा सकता है ?


1. एडवांस सिग्नलिंग सिस्टम (pts)

आधुनिक ट्रेनों में एडवांस सिग्नलिंग सिस्टम बेहद ही जरूरी है। वर्तमान में ज्यादातर देशों की ट्रेनों में पॉजिटिव ट्रेन कंट्रोल जैसे एडवांस सिग्नलिंग सिस्टम लगे होते हैं। यह PTC टेक्नोलॉजी ट्रेन की सभी गतिविधियों की निगरानी और उसके नियंत्रण के लिए GPS के साथ-साथ वायरलेस कम्युनिकेशन और ऑनबोर्ड कंप्यूटर के संयोजन का इस्तेमाल करती है। ट्रेन- टू-ट्रेन टक्कर , ओवरस्पीड डिरेलमेंट्स, गलत स्थिति में स्विच के माध्यम से ट्रेनों की आवाजाही आदि को मजबूत करने और कार्यात्मक रूप से ऐसी दुर्घटना को रोकने के लिए रोकने के लिए इस कम्युनिकेशन- बेस्ड और प्रोसेसर-बेस्ड ट्रेन कंट्रोल टेक्नोलॉजी का उपयोग करता है। 




2. ट्रेन टक्कर बचाव प्रणाली (tcas)

य़ह यात्रा के दौरान दूसरी ट्रेन , वाहन , या पैदल चलने वाले लोगों सहित पटरियों पर आने वाली अन्य बाधाओं का पता रडार, लिडार और अन्य सेंसर तकनीकों का इस्तेमाल से लगाती है। ये सिस्टम ट्रेन ऑपरेटरों (लोको पायलटों) को रीयल- टाइम अलर्ट प्रदान करता हैं, जिसके सहारे पायलट को टकराव से बचने के लिए तत्काल कोई कार्रवाई करने में मदद मिलती है।


3. स्वचालित ट्रैक निरीक्षण (ATI)

संभावित खतरों की पहचान के लिए पटरियों का नियमित निरीक्षण जरूरी है। इसलिए इस खतरे की पहचान के लिए स्वचालित ट्रैक निरीक्षण यानी ऑटोमेटिक ट्रैक इंस्पेक्शन टेक्नोलॉजी बेहद ही कारगर है। य़ह टेक्नोलॉजी लेजर और कैमरों से लैस ट्रैक ज्योमेट्री कारें, अन्य गड़बड़ियों और विसंगतियों का पता लगाने के अलावा ट्रैक की स्थिति का त्वरित आकलन उसके निवारण के लिए सिग्नल भेजती है। जिसे हम ट्रैक रिकॉर्डिंग कार भी कहते हैं। 


4. संभावित जोखिमों की पहचान और रखरखाव

बहुत सारी टेक्नोलॉजी ऐसी होती है जो संभावित जोखिमों का पता आसानी से लगा लेती हैं। इन तकनीकों को लागू करने से ट्रेन की अन्य संभावित गड़बड़ियों को पहचानने में मदद मिल जाती है। जैसे की ट्रेनों में तापमान, कंपन और निगरानी प्रणाली आदि। इनके डेटा का एनालिसिस करके शुरुआती चेतावनी संकेतों का पता आसानी से लगाया जा सकता हैं।जिसके बाद दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अन्य उपाय किया जा सकता हैं।


5. उन्नत संचार प्रणाली

 ट्रेन हादसों को रोकने के लिए ट्रेन ऑपरेटरों, कंट्रोल सेंटर और रखरखाव कर्मियों के बीच बातचीत या संवाद का होना बेहद आवश्यक है। इसके लिए वायरलेस डेटा नेटवर्क तथा रीयल-टाइम रिपोर्टिंग टूल के साथ आधुनिक संचार प्रणालियां भी मौजूद रहती है जो किसी भी जानकारी को तेजी से भेजने में सक्षम होती हैं। आपात स्थिति में एक टीम का दूसरी टीम के साथ समन्वय और तुरंत प्रतिक्रिया देना भी हादसे को टाल सकता है।



रेल हादसों को रोकने में अग्रणी हैं ये देश

1.जापान

 कुशल और सुरक्षित ट्रेन सिस्टम के लिए फेमस जापान ने दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अलग अलग प्रकार के कई एडवांस तकनीकों को लागू किया है। इसमे अत्याधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम और स्वचालित ट्रेन नियंत्रण आदि है। इनकी बुलेट ट्रेन का वर्ल्ड रिकॉर्ड है कि इसमें आज तक कोई एरर नहीं हुई है। जापान उन्नत ट्रैक निरीक्षण और रखरखाव तकनीकों को अपनाते हुए नियमित निरीक्षण और रखरखाव पर काफी जोर देता है।



2.जर्मनी

जर्मनी अपने कठोर सुरक्षा मानकों और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी में निरंतर निवेश के लिए मशहूर है। जर्मनी ने यूरोपीय ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ETCS) सहित कई अन्य ट्रेन कंट्रोल सिस्टम व्यापक रूप से लागू किए हैं, जो विभिन्न रेल नेटवर्कों में सुरक्षित ट्रेन संचालन सुनिश्चित करती है। जर्मनी कर्मचारियों की ट्रेनिंग पर भी काफी जोर देता है तथा समय पर जरूरत के मुताबिक नियमित सुरक्षा भी ऑडिट करता है।


3.दक्षिण कोरिया

दक्षिण कोरिया ने ट्रेन हादसों को रोकने में काफी प्रगति की है। ट्रेन सिस्टम ऑटोमेटिक ट्रैक निरीक्षण तकनीकों के साथ एडवांस सिग्नलिंग और अपने कम्युनिकेशन सिस्टम से लैस हैं। यह देश हाई-स्पीड रेल नेटवर्क में एक उत्कृष्ट सुरक्षा रिकॉर्ड है। जिसे केटीएक्स के नाम से भी जाना जाता है।



4.यूनाइटेड किंगडम 

यूनाइटेड किंगडम ने ऑटोमैटिक वॉर्निंग सिस्टम और हाल ही में यूरोपीय रेल यातायात प्रबंधन प्रणाली (ईआरटीएमएस) जैसी उन्नत ट्रेन सुरक्षा प्रणालियों को लागू किया है। ये प्रणालियां रीयल-टाइम अलर्ट के साथ ऑटोमैटिक ब्रेकिंग क्षमताएं भी प्रदान करती हैं। जिससे ट्रेनों में टक्कर और उनके पटरी से उतरने के जोखिम को काफी कम किया जा सकता है।


ट्रेन हादसों को रोकने के लिए एडवांस तकनीकों, रखरखाव और कुशल संचार प्रणालियों के संयोजन की आवश्यकता होती है। एडवांस सिग्नलिंग, टकराव से बचाव सिस्टम, स्वचालित ट्रैक निरीक्षण और उन्नत संचार जैसी नवीनतम तकनीकें दुर्घटनाओं को रोकने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और यूनाइटेड किंगडम जैसे बड़े देशों ने इन तकनीकों को लागू कर और यात्री सुरक्षा को प्राथमिकता देने में सफलता हासिल की है। सफलता की इन कहानियों से सीखकर और उपायों में निवेश करके भारत भी सुरक्षित ट्रेन यात्रा को बढ़ावा दे सकता है।

Tuesday, 16 May 2023

मुझे चाँद चाहिए ...

 

 


बचपन की कुछ यादें, जो हमेशा ही हमारे जहन मे रहती है उनमे चाँद पाने की तमन्ना पहले स्थान पर है। माँ द्वारा अपने छोटे बच्चे को खान लेने क बदले में चाँद देने का वादा करना, किसी प्रेमी या प्रेमिका द्वारा अपने प्रेम की सीमाओं को एक दूसरे से परे बताते हुए  चाँद दिलाने की भरोसा दिलाना, या फिर किसी आम आदमी द्वारा अपनी तरक्की के ऊँचाई को नापने के लिए चाँद पर जाने की बात कहना । उन महत्वपूर्ण बातों की गारंटी है जिसके लिए हम चाँद को गिरवी रख देते है। तो दूसरे ओर यह हमारे उन काल्पनिक ख्यालों को बार बार एक वास्तविक स्वरूप देने का काम करती है, जिसकी वास्तविकता ही उसका काल्पनिक होना है।

पिछले कुछ दिनों से इस उपन्यास को पढ़ रहा था। पहली पंक्ति से लेकर आखिरी शब्द तक उपन्यास का शीर्षक '' मुझे चाँद चाहिए '' के कई किरदारों से परिचय हुआ। इनमें उन किरदारों से राबता भी हुई  जिसकी रचना सुरेन्द्र वर्मा ने की नहीं है। शायद यही हमारे कहानी का आखिरी सत्य भी है। अपनी तमन्नाओं को लिए, अपने वास्तविकता से जूझते हुए न जाने किस काल्पनिकता की तलाश मे हम जीवन भर खोए रहते है। कभी खुद के कहानी में तो कभी औरों के। इच्छाओं को साथ लेकर जीने की कला हर किसी में नहीं हुआ करती है। मुझे लगता है कि मानव होने के अगर बहुत से फायदे है तो कुछ बड़े नुकसान भी है। इन नुकसान में सबसे बड़ा है मानव का समाजिक बंधनों में बाँधने या बँधने की परंपरा। हालांकि यही वह कारण भी है जो मानव को अन्य प्राणियों से अलग करता है। खैर इस बात को समझते है...  सबसे पहले तो यह है कि हमने विकास के मायनों को बदल दिया है। इसका एक निश्चित मापदंड निर्धारित कर रखा है, जो इसपर खड़ा उतरता है वह सफल दूसरे सभी असफल है। हमने समाजिक, आर्थिक , राजनैतिक, संस्कृतिक आदि बंदिशे तैयार कर रखी है। जो हमें परस्पर एक दूसरे को तुलना करने के लिए प्रेरित और तैयार करता है। यही एक मुख्य कारण है कि हम अक्सर अपने सोचने के दायरे मे सीमित होकर सोचते है। मगर सबसे बड़ी बात तो ये है कि ये दायरे हमने ही निर्धारित कर रखा होता है। ये दायरे क्या है? लोग क्या कहेंगे? मुझसे नहीं होगा। हम आर्थिक रूप से कमजोर है। हम मिडिल क्लास से आते है। हमारे परिवार की ये परंपरा नहीं है। मुझे यह पसंद नहीं कि तुम ऐसा करो। आदि कई सारे विचार जो दरअसल एक मिथ्या ही तो है।  इसकी जानकारी के वावजूद भी हम रोज फँसते रहते है। फिर एक दिन आता है जब हमारा दोष लोगों द्वारा हमारे ही माथे चढ़ा दिया जाता है,और हम उसी चक्र मे फँस जाते हैं, जिससे निकलने की सलाह, हमे उन्हीं लोग से पहले से मिल रही होती है।

उपन्यास की कहानियों और किरदारों का केंद्र कला है। लेकिन इसका आधार समाजिक परम्पराएँ, विचारधाराओं, राजनीति, संस्कृति, और सबसे महत्वपूर्ण कि एक सोच पर निर्मित किया गया है जिसकी लोकप्रियता इसलिए है क्योंकि इसके अधिकांश भाग नेपथ्य में तैयार किए जाते हैं। हमारी लाख कोशिश के बाद भी हम कुछ चीज़ों को इसलिए नकारा नहीं सकते क्योंकि हम ऐसा चाहते हैं। ऐसा इसलिए भी है कि हमारी इच्छा तो य़ह भी होती है कि हमे हमारी पहचान मिले,वो भी ख़ुद की। फिर तो जैसा सर्किल तैयार हो चुकी है उसी पर घूमना होगा अन्यथा बैलेंस बिगड़ते ही हम एक साइड हो जाएंगे और बारी किसी दूसरे की आ जाएगी। इसके इतर भी एक उपाय है कि हम सर्किल में चलते हुए उस अवस्था पर जाएं जहाँ ना तो किसी का प्रभाव केंद्रित होती होती है और ना ही विकेंद्रित। इस उपन्यास की नायिका भी ऐसा करने का भरसक प्रयास करती है, मगर इस केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण रोक नहीं पाती है। जिसका नतीजा होता है, कि उसकी काल्पनिक तमन्ना एक वास्तविक स्वरूप तो लेती है मगर उसका प्रभाव खत्म नहीं होता। शायद उसके चाँद का स्वरूप वही रहता है। जिसे पाने की तलाश मे वो इतना कुछ कर गुजरती है।

चाँद की चाहत और उसे पाने की तम्मना के बीच कितनी चीजें होती है। ख़ुद का साथ से लेकर लोगों के नाउम्मीदों वाली कुछ उम्मीदें तक। हँसी से लेकर तालियों तक। फ़िर हमे वो वजूद मिलता है जिसके लिए हम पहले, अभी और बाद में ना जाने कितने किरदारों में छुपते, छुपाते किसी मुक़ाम पर पहुँचते हैं। जहाँ से नीचे आने में डर लगता है और उपर जाने की ताकत नही बचती। मेरे समझ से यह उपन्यास उसी का पर्याय। 


मुझे चाँद चाहिए हिन्दी के लोकप्रिय साहित्यकार सुरेन्द्र वर्मा की रचना है, जिसके लिये उन्हें 1996 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
 

Wednesday, 22 March 2023

पलायन और बिहार



समानार्थी शब्द ऐसे शब्द होते हैं, जो एक समान अर्थ रखते हैं। इसके अलावा  कुछ ऐसे शब्द भी है जो  समानार्थक नही है लेकिन उसके भावार्थ समान होते है। मगर बोल चाल के दौरान हम कुछ ऐसे शब्द का ईस्तेमाल करते है, जिनके अर्थ ,भाव आदि कुछ समान नही होते लेकिन कहने का तात्पर्य, उसका आशय , कहने के मायने सब समान होते हैं। हालांकि ऐसे शब्द व्याकरणिक दृष्टिकोण से सही नही है, लेकिन परिस्थितिवश उन शब्दों के प्रयोग हम एक अर्थ के लिए कर रहे होते हैं। बिहार और पलायन के मायने भी कुछ इसी तरह है।


 कैसी बिडम्बना है,आज आजादी के 75 सालों बाद  देश के अन्य प्रान्त विकास के नए आयामों को छु रहे है, यह प्रदेश अपनी विरासत को संभालने में भी असफ़ल रहा। राजनैतिक, सांस्कृतिक,  लोकतांत्रिक, समाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक , और कानूनी रूप से मजबूत इस प्रदेश के लिए आज यही शब्द व्यंग्यात्मक पर्याय बन गया है। रोटी, कपड़ा , अवास जैसी मूलभूत ज़रूरतों के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, आदि कई सारी समस्याएं हैं ,जिसके निवारण के लिए यँहा के लोग अपने ही देश में प्रवासी शब्द के पर्याय बने हुए हैं। 



वर्तमान के परिदृश्य की तुलना अगर अतीत से किया जाय तो प्राचीन बिहार ही है जिसने खुली अर्थव्यवस्था की नींव रखी थी।  269 - 232 के प्राचीन भारत में जब अशोक का शासनकाल था। और अशोक मगध के गद्दी का शासक था, उसने अपने राज्य में खुली अर्थव्यवस्था पद्धति का विकास किया था। जिस अर्थव्यवस्था के कारण लोग रोज़गार, उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, शिक्षा, आदि के विकास के लिए  स्थानांतरित होते हैं। लेकिन यह स्थानांतरण आज बिहार जैसे राज्य के लिए अभिशाप बन गया है क्योंकि इस अर्थव्यवस्था के कारण ही आज इसकी खुद की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी है। हालांकि यह हक़ीक़त पूर्णतः सही  भी नहीं है लेकिन थोड़ी हक़ीक़त ये भी है। क्योंकि अगर जिन विषयों के कारण लोग पलायन कर रहे है। उसका समाधान अगर यही हो जाए तो पलायन की जरूरत क्यों ही होगी? और अगर एक जगह पर दूसरे जगह के लोगों को उनके समस्या का निराकरण नहीं मिलेगा वो वहाँ क्यों ही जाएगा ? 


बिहार से पलायन की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

 

1951 में पूरे भारत में कुल 6982 रजिस्टर्ड फैक्ट्रियां थी जिनमे 445 सिर्फ़ बिहार में थी। मतलब कि पूरे देश की कुल 6.51% फैक्ट्री सिर्फ़ बिहार में। लेकिन आज इसकी संख्या कितनी है इसकी  पूरी जानकारी मे भी संशय बना हुआ है।  आज प्रदेश के लाखों लोग पलायन के दर्द को इसलिए  झेल रहे हैं क्योंकि उन्होंने एक मजबूर सरकार का चयन किया है। मेरा ऐसा कहना इसलिए भी गलत नहीं है क्योंकि पिछले 30 सालों से मुख्य रूप से जिन दो पार्टियों ने राज्य में शासन किया। राज्य की हालत की ज़िम्मेदारी उन्हीं दो पार्टियों की सबसे अधिक है। पिछले 30 सालों में जब अन्य राज्यों में विकास के नए पँख लगाये जा रहे थे। ये पार्टियां अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए राज्य को अलग दिशा में ले जा रही थी। जो आज भी जारी है। जिन समस्याओं का समाधान शायद हो जाना चाहिए था वही आज सबसे समस्या बन गयी है, जिसका समाधान करना सरकार तो नहीं चाहती... क्योंकि अगर इसका निराकरण हो गया तो इनके चुनावी जुमले में  मुद्दों की कमी हो जायेगी। और ऐसा हो ये पार्टियाँ कदापि नहीं चाहेगी। 


पलायन की मजबूरियां ...



रोजगार की कमी है। प्रदेश का एक बहुत बड़ा हिस्सा बाढ़ से प्रभावित है।  रोज़गार की स्थिरता नहीं है। पारिश्रमिक दर अन्य राज्यों की तुलना में  बहुत कम है। उद्योग की कमी है, और जो उद्योग है वो भी धीरे-धीरे बंद हो रहे हैं। व्यापार और व्यवसाय के लिए कोई विकल्प नहीं है। या फ़िर कहे की अवसर नहीं है। शिक्षा व्यवस्था तो प्रतिदिन सवालों के घेरे में आती ही रहती है । स्वास्थ्य सुविधा के  बदतर हालात के बारे में क्या ही कहने? 

इस हालात में प्रदेश के नागरिकों के पास सिवाय पलायन के कोई विकल्प नहीं है। वो ना चाहते हुए भी  पलायन की मजबूरियों का शिकार होते हैं। क्योंकि मूलभूत सुविधाएं तो हर किसी की पहली जरूरत है। और यही इन्हें अपने प्रदेश में नहीं मिलती ,या फ़िर कहे की इनकी जरूरतें पूरी नहीं हो पाती है।  अन्य राज्यों की तुलना में इन्हें कम पारिश्रमिक मिलता है। भारत में सबसे कम प्रतिव्यक्ति आय और सबसे ज्यादा असमानता वाला राज्य बिहार ही है। इसके अलावा राज्य से पलायन की मजबूरी राज्य में छोटे छोटे उद्योग का ना होना भी है। क्योंकि ऐसे कई उद्योग है, जो आज़ादी के समय और उसके बाद भी कुछ दिन तक बड़े पैमाने पर पलायन की समस्या का निराकरण कर रहे थे। लेकिन बाद में उन्हीं का अस्तित्व ख़त्म हो गया। उदाहरण के लिए आज़ादी से पहले राज्य में 33 चीनी मिलें थी आज आधा दर्जन के आसपास ही है, जिनकी हालात भी नाज़ुक है। उद्योगों की कमी का ठीकरा राज्य सरकार , राज्य की भौगोलिक स्थिति , जिसमें इसका लैंड लॉक्ड  होने की बात पर फोड़ रही है लेकिन असली कारण तो कुछ और ही है। क्योंकि अगर लैंड लॉक्ड होना समस्या होता तो  देश के अन्य राज्य जैसे हरियाणा, आदि उसकी हालत  तो बिहार से बेहतर है। बिहार की औद्योगिक विकास की नीतियों में खामियों के वज़ह से लोग यहाँ निवेश करने से कतराते है। इसमें जिस  सिंगल विंडो क्लियरेंस की बात कही गयी है, मेरे समझ से उसमे सुधार की जरूरत है। 

 

बदतर होती हालात....

देश की आज़ादी के पहले दशक (1951-1961) में पलायन की जो संख्या महज 4% थी। उसमें कमी आने के बजाय बढ़ोतरी होती गयी। आज देश के 13% (2011 के जनगणना के अनुसार,  वर्तमान में य़ह आँकड़ा  लगभग 15 % है अलग अलग संस्थानों द्वारा जारी आंकड़ों का औसत भारत सरकार द्वारा अधिकारिक आंकड़े नहीं जारी किए गए हैं ) प्रवासी लोग इसी प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। जो भारत में दूसरे स्थान पर है।   हालत यह है कि वर्तमान में प्रदेश के 55%  रोज़गार, 3-5% शिक्षा और 3 % लोगों को व्यापार के लिए राज्य से पलायन करने की मजबूरियां है। लेकिन सरकार राज्य में उद्योग, रोज़गार, शिक्षा आदि में विकास की बड़ी बड़ी डींगें हांकने में कभी पीछे नहीं रहती है।




एनसीएसपी( नेशनल करियर सर्विस पोर्टल) के अनुसार  बिहार में बेरोजगारों की संख्या में पिछले एक साल में 3 गुना बढ़ी है। 2005 मे राज्य की ग़रीबी दर 54.5 % थी जो आज मामूली अंतर के साथ  51. 9 %  है। लेकिन सरकार इस उपलब्धि को अलग तरीके से देख रही है। दरअसल वर्तमान वर्ष में भारत की बेरोजगारी दर 7.5 % और बिहार की 12.3% । इस आंकड़े को राज्य सरकार महामारी और गिनती में अधिकारिक आंकड़े की बात कर अनदेखा कर रही क्योंकि महामारी के कारण 2021 में केंद्र सरकार जनगणना नहीं करा सकी। हालांकि अन्य कोई भी ऐसे कार्य जिससे सरकार की उपलब्धियों का बोध होता है, उसमे कोई रुकावट नहीं देखने को मिला। 


मुँह मोड़ती सरकार...


राजनीतिक फायदे के लिए पक्ष और विपक्ष अपने विचारधाराओं को ताक पर रख देते हैं। लेकिन बात जब आम लोगों की परेशानियों की हो तो किसी  के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। ताज़ा उदाहरण तो जातिगत जनगणना ही है। इस कार्य के लिए राजनैतिक दलों ने प्रदेश सरकार ने आखिरकार बिहार में जातिगत सर्वेक्षण कराने के फैसल पर मुहर लगा ही दी। लेकिन देश के अन्य राज्यों में कितने प्रदेशवासी हैं और उसकी हालात क्या है। इस विषय पर कोई चर्चा नहीं। प्रदेश के मज़दूरों के साथ जब चीज़ें बिगड़ रही होती हैं, इनका जबाब एक ही होता है " मामले को संज्ञान में लिया गया है, और जाँच की जा रही है।"लेकिन हक़ीक़त ये है कि ये राजनैतिक भाइचारे के लिए एक दूसरे  से गले मिल रहे होते हैं।  विकास के कार्यों में हो रही कोताही इन्हें नहीं दिखता, परीक्षा के प्रश्नपत्र के लीक होने की वजह इन्हें  मालूम नहीं होती, अभ्यर्थियों पर लाठीचार्ज की जानकारी इन्हें नहीं होती, विधानसभा में बैठकर जब धार्मिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक  सद्भावना को लेकर अनाप सनाप बोलने वालों की बातें इन्हें सुनाई नहीं देती। लेकिन राजनैतिक फायदे के लिए ये  किसी भी हद तक जाने में इन्हें किसी प्रकार की कोई कोताही बरतने की जरूर नहीं पड़ती है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता तो सिर्फ़ वोट देने के लिए नहीं  है। जिस चीज को समझना होगा। राजनीतिक दलों को अपने विचारधारों में संप्रदायवाद , जातिवाद , आदि को छोड़कर विकास को प्राथमिकता देने की जरूरत है। ताकी हम तरक्की के आयामों को छूने के कदम से कदम बढ़ाकर चल सके। अपने प्रदेश को उस ऊंचाई तक ले जाएं जहां हमसे ऊपर कोई नहीं हो। 

राजनैतिक , समाजिक  आर्थिक रूप से कमजोर होना सिर्फ वक्त का खेल है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो जो राष्ट या भौगोलिक क्षेत्र आज मजबूत बने है कुछ समय पहले अपनी पहचान के लिए भटक रहे थे। सोने की चिड़ियाँ माने जाने वाला देश आज फिर से विश्व को अपने कदमों में झुका रहा है, और दुनियाँ झुकने को तैयार है। तो इसका मतलब है की हमारे देश बदल रहा रहा है। हम मजबूत हो रहे हैं। लेकिन अभी हम उस मुकाम पर नहीं पहुँच पाए है जहां हमे पहुचना है। हमे विकास के नए आयामों को छूने के लिए प्रयास करते रहना होगा। और हमे कदम मिलाकर चलना होगा।  


Saturday, 18 March 2023

वैश्विक मंच पर शक्तिशाली होती हिन्दी।

                                                                                               




हिन्दी साहित्य के बहुत कम लेखक हुए जिन्हे विश्वपटल पर वो मुकाम हासिल हुई जो की अन्य भाषा साहित्य के लेखकों को मिली है । लेकिन पिछले दिनों एक के बाद एक अंतरराष्ट्रिय सम्मान से सम्मानित होने का अवसर हिन्दी के लेखकों को मिलना ,इस भाषा के लिए गौरव की बात है। मेरा ऐसा कहना, शायद इस भाषा की विरासत के लिए गुस्ताखी होगी, लेकिन आज आधुनिकरण के चलते जिस तरह इस भाषा की अपेक्षा हो रही है, उस हिसाब से यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। हालांकि इस बात को नकारा नहीं जा सकता की कोई भी सम्मान किसी भाषा की लोकप्रियता का आधार नहीं हो सकता और न ही है। आज भारत में हिन्दी बोलने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन बात इस भाषा की लोकप्रियता की नहीं बल्कि वैश्विक पहुँच की है। जिसमें यह भाषा कामयाब हो रही है। जिसका परिणाम है कि भाषा के लेखनी को वैश्विक पहचान मिल रही है। 


मार्च का यह महीना इस साहित्य के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया। जब अमेरिका की साहित्यिक संस्था पीईएन द्वारा प्रेस विज्ञप्ति मे जब यह घोषणा की गई कि हिन्दी के लेखकों में सबसे विशिष्ट और प्रतिष्ठित अंतरराष्टीय साहित्य सम्मान इस बार भारत के झोली में जा  रहा है।भारत के लिए  सबसे बड़ी बात यह की यह पहली बार आ रहा है। इससे पहले रेत समाधि के गीतांजलि श्री को बुकर , और फिर यह पीईएन सम्मान ,हिन्दी साहित्य के एक बड़ी उपलब्धि है जो आने वाले साहित्यकारों के लिए मिसाल बनेगी। श्री शुक्ल की पहली कविता साल 1971 में छपी थी और आज 52 सालों के बाद उन्हे अंतरराष्टीय स्तर के इस साहित्यिक सम्मान से सम्मानित किया जाना, यह दर्शाता है कि सफलता की कोई एक उम्र नहीं होती है। बस आपको तटस्थ रहना होता है।


अपनी सफलता पर शुक्ल कहते हैं कि मेरा लोकल होना ही ,मेरे वैश्वीक होने का प्रमाण है। और उनकी यह बात उनकी लेखनी में झलकती है। जो उन्हे इस सम्मान के लायक समझता है। ऐसी ही बातें पीईएन के जजों द्वारा भी कही गई। और हो भी क्यों नहीं, बात जब किसी प्राथमिक होने की हो, उसके पहचान की हो , तो मेरे समझ से इस बात की संभावना बहुत बढ़ जाती है, कि वो अपने आप से कितना जुड़ा है। और इस सम्मान से पहले से जो भी व्यक्ति, या पाठक श्री विनोद शुक्ल से राबता रखते हैं, उन्हे मेरे इस कथन से सायद कोई विशेष आपत्ति नहीं होंगी। क्योंकि किसी एक दौर में श्री शुल्क को समेट देना, उनकी लेखनी के साथ ज़्यादती होगी।


 आज जब हम सम्मान के कारण श्री शुल्क को इतने करीब से जानने की कोशिश कर रहें है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए उनकी पहचान सिर्फ सिर्फ इसी सम्मान से नहीं है उनके साथ उनकी  पिछले 52 साल की लेखनी है। जो उनकी पहचान और समृद्ध करती है। ऐसे कितने नामी गुमनामी व्यक्तित्व है, जिनकी पहचान आज तक नेपथ्य में ही छिपी है। कारण जो भी हो लेकिन मंच के एक कोने में सीट उनकी भी पक्की होनी चाहिए ताकी हमारी यह भाषा और वैश्विक पटल पर और समृद्ध दिखे।  

 

बात जब वैश्विक और लोकल होने की है तो हमे खुद से पूछना चाहिए कि हम किस श्रेणी में आतें है? यह विवाद इसलिए है क्योंकि अगर गिनती के कुछ लोगों को छोड़ दिया जाय तो हममें से सिर्फ गिनती के कुछ लोग ,गिनती के हिन्दी साहित्यकार को जानते है। जबकि हमरा संबंध ऐसे राष्ट से है जहाँ हिन्दी की विशालता है। इसके वावजूद इस भाषा में बोलने वाले , लिखने वाले, पढ़ने वाले , और समझने वालों की संख्या कुछ इतनी है कि किसी किताब मेले में , या किताब के दुकानों पर अक्सर उन्हे कल आने के लिए कहा जाता है। या फिर उनसे किताब के बदले कोई अन्य भाषा की किताब के लिए प्रेरित कर दिया जाता है। 


आपको याद होगा कि कैसे बुकर सम्मान ने रेत समाधि पुस्तक की लोकप्रियता बढ़ा दी। आज श्री शुल्क की भी लगभग वही दास्ताँ है। पीईएन की घोषणा के बाद जब श्री शुल्क से उनकी संघर्षों के किस्सों की बात पूछी गई, उनके शब्दों से यह हकीकत झांक रही थी। हद तो तब हुई जब एक पत्रकार ने उनसे उस कविता के बारे जानना चाहा जिसकी रचना उन्होंने की ही नहीं। ऐसे में दोष किसे दे ? क्योंकि ऐसा पहली बार तो नहीं था। इससे पहले रेत समाधि की भी यही मजबूरी थी, जिस किताब को सम्मान के वावजूद आलोचना झेलनी पड़ी। पाठकों की एक वर्ग ने उपन्यास के भाषा शैली पर प्रश्न उठाए। सवाल यह है कि हम अपनी विरासतों पर गर्व क्यों नहीं कर पा रहे। हमे  हमारी चीजों से कोई और क्यों वाकिफ करवा रहा? पिछले दिनों जब फिजी के नादी शहर में 12 वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ तो, कही न कही इसका मकसद इस भाषा को वैश्विक पहचान दिलाना था। और एक के बाद एक अंतरराष्टीय सम्मान यह साबित करती है कि हम कामयाब हो रहे है, लेकिन कामयाबी अभी बहुत दूर है। 



 


Thursday, 8 December 2022

चुनावी नतीजों के बाद किसकी सरकार बनाती है राजनैतिक पार्टियां?

 


आज देश के चार राज्यों में हुई चुनाव के नतीजों के साथ लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण इकाई समाप्त हुआ। जिनमें गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (156+*), और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस (39+*), छत्तीसगढ़ विधानसभा उप चुनाव में कॉंग्रेस, उत्तरप्रदेश लोकसभा उप चुनाव में समाजवादी पार्टी, उड़ीसा विधानसभा में बीजेडी ने और बिहार में विधानसभा उप चुनाव में बीजेपी ने एक विजय हासिल की। 

चुनाव के पहले से लेकर आख़री दिन तक कुछ चीजें बहुत चर्चा में रही। जिसमें सरकारी कार्यों को लेकर काफ़ी चर्चे भी हुए। चुनाव में भाग लेने वाली कुछ पार्टियाँ अपने पिछली कार्यों की प्रशंसा कर रहीं थीं तो कुछ करने वाले कार्यों के लिए वादे कर रही थी। जनता पिछली सरकार से सवाल पूछ रही थी और आने वाली सरकार के लिए सोच विचार कर रही थी। राजनेता एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर रहे थे। इस दौरान देश की मीडिया अपने कार्यों में उलझी थी, और जनता के सवालों को और सरकार के वादों की समीक्षा में व्यस्त थी । लेकिन अंत में जनता ने फैसला सुना दिया। जब ये चुनाव ख़त्म हो गए हैं तो एक बार फ़िर से सरकार किसकी बन रहीं है? कौन है जो सत्ता में वापसी कर रही है ? किसी पार्टी को कितनी सीट मिली है? कौन जीता है? कौन हारा है? आदि सवालों के नतीजों की तलाश जारी है। यह तलाश अगले कुछ दिनों तक चलेगी। और फ़िर उसके बाद यह चर्चे होंगे कि वो क्यों हार गये? वो सत्ता में वापस क्यों नहीं आ पाई? इसके अलावा और भी कई सवालों के जवाब ढूंढे जाएंगे। और इस तरह फ़िर एक नयी चुनाव की तारीख़ आ जाएगी जिसकी तैयारी में फिर सब लोग जुट जाएंगे। मगर चीज़ें वही रह जाएंगे।



 इन सब के बीच सवाल य़ह है कि ऐसी तत्परता सिर्फ़ चुनाव के लिए क्यों? लोकतंत्र के अलग अलग आयामों में सिर्फ चुनाव को प्रधानता क्यों? अन्य पहलुओं को लेकर तमाम बातों को क्यों नकारा जा जाता है। बहुत कम देखने को मिलता है कि" इन कारणों के चलते चुनाव को रद्द किया जाता है" , जबकी एक छोटी सी अफ़वाहों या अफ़सरों की गलती का खामियाजा लाखों निर्दोष छात्रों को उठाना पड़ता है जिनकी परीक्षा रद्द हो जाती है। किसी भी प्रस्थिति में चुनाव परीणाम में कोई देरी नहीं होती लेकिन विभिन्न परीक्षा की ना सिर्फ़ गोपनीयता भंग हो जाती है बल्कि उसके परीणाम को लेकर भी कई सारी दुविधा रहती है। परीणाम में देरी हो जाना तो आम समस्या है ही। फ़िर रोज़गार, आदि के हक़ीक़त से तो हर कोई वाकिफ़ है । इसके पीछे क्या वज़ह हो सकता है। 

आप अलग-अलग पार्टी की रणनीति को समझिए। एक चुनाव के दौरान अलग अलग पार्टियाँ चुनाव लड़ती है। लेकिन नाम सिर्फ़ एक या अधिक से अधिक तीन पार्टियों की होती है। जीत हार भी उसी एक पार्टी की मायने रखती है। लेकिन क्या यह जमीनी हक़ीक़त हो सकती है? नहीं। क्योंकि एक चुनाव के दौरान लोगों की धारणा अलग अलग होती है। पार्टियाँ उन धारणाएँ को समेट कर अपने पक्ष में करने की प्रयास करती है जो जीत और हार निश्चित करती है। फिर सवाल आता है कि फ़िर जिक्र किसी एक पार्टी की वोटों की क्यों की जाती है? और वो पार्टी कौन होगी इसका निर्णय कौन करेगा? आज किसी भी प्रकार के प्रतिस्पर्धा में सबसे ज्यादा चुनौती किसकी होती है और यह किसकी होनी चाहिए? जब आप यह देखेंगे कि कौन जीता और कौन हारा तो आप अपने तरीके को थोड़ा सा परिवर्तित कर यह पार्टी के नेतृत्व के अलावे व्यक्तित्व के आधार पर देखने की कोशिश करिये। आपको आपके सवालों के जवाब आसानी से मिल जाएगी। 



आज जब सभी फैसले आ चुके है फ़िर जीती हुयी पार्टी जो सरकारी तंत्र में अपनी ज़िम्मेदारी को सम्भालने वाली है उसकी क्या उतरदायित्व है? ऐसे सवालों की आशंका इसलिए है क्योंकि पिछली कई सरकारें ने अपने वादों की पूर्ति करने के लिए कोई भी ऐसा प्रयास करना सही नहीं समझा जिसके कारण जनता का भला हो सके। हालांकि अपवाद की गुंजाइश भी है इसमें किंतु सवाल य़ह है कि ये अपवाद भी सीमित होते हैं। अब जब सरकार बदली है तो जनता की अपेक्षा अधिक है जिसकी पूर्ति करना नवगठित सरकार की है। हालाँकि इस बात का भी उजागर वक्त की हाथों में है कि ये अपवाद किस प्रकार के होने वाले हैं। 

जितने वाले सभी जनप्रतिनिधियों को हार्दिक बधाई।



Sunday, 4 December 2022

सही और गलत के बीच विभाजन की दीवार!!!

 


भाषाई विविधता, क्षेत्रीय भिन्नता, आदि के कारण किसी प्रदेश का विभाजन कितना सही और गलत हो सकता है। भारत पूर्व काल से ही इसका साक्षी रहा है। हालांकि इसकी अपनी एक उपलब्धता भी है मगर इसके कारण जो व्यक्तिगत, समाजिक, और राजनैतिक धारणाएँ उत्पन्न होती उसका निवारण मुश्किल है। क्योंकि किसी क्षेत्र का विस्तार,उसका फैलाव, सिर्फ़ इन मानवीय संबंधों के आधार पर नहीं होता है। इसके फैलाव के मुख्य कारणों में प्रकृति का भी योगदान है। खैर ये अलग विषय है। अभी बात करते हैं,किसी प्रदेश के समाजिक, राजनैतिक और अन्य पहलुओं को लेकर जिसके बदौलत इस बात की चर्चा होती है कि कौन व्यक्ति किस समाज, संप्रदाय, जाति, प्रदेश, आदि का माना जाएगा। और वर्तमान में इसकी पहचान की एक मात्र इकाई है उसका जन्म। इसका एक पहलु यह भी है कि एक समय के बाद पहचान परिवेश का ना होकर व्यक्ति की अपनी हो जाती है। फिर वो धीरे-धीरे अपने अनुसार अपने परिवेश को व्यवस्थित करने पर जोड़ देता है। जिसमें उसकी ईमानदारी यह निर्धारित करती है कि यह बदलाव होगा कि नहीं। इसमें समय की मांग, समाजिक एकजुटता भी मुख्य कारक होते है। अगर देखे तो इसमें कई आयाम होते हैं। और यह सिर्फ समय के द्वारा निर्धारित किया जाता है। कोई विशेष व्यक्ति , संस्था या समूह सिर्फ़ इसका एक हिस्सा हो सकता है ना कि वो कारक का आधार। इसमें अपवाद की गुंजाइश है लेकिन शर्त है कि समय,और समाज की स्थिरता उसके साथ रहनी चाहिए। और इसके उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। लेकिन किसी भी प्रस्थिति में इस चीज को नकारा नहीं जा सकता कि समय की अपनी एक जरुरत होती है। और यही वज़ह है कि प्रकृति ने मानव को पृथ्वी का एक पूरा हिस्सा दिया था, लेकिन आज य़ह कई हिस्सों में विभाजित हो गया है। जिसके अपने सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव है। लेकिन सवाल यहाँ विभाजनों का नहीं है,बल्कि सवाल य़ह है यह कब तक लोगों की जरूर बनेगी और कब तक मानव अपने विकास के लिए इस सीढ़ी का प्रयोग करेगा? किसी एक पहलु को लेकर तमाम खबरों को खारिज किया जाना और उससे जुड़ी अन्य पहलुओं को स्पष्ट किया जाना कब तक मानव जाति के लिए एक सही कदम उठाने की कोशिश होगी?


 उदाहरण के लिए आज हम बिहार के एक प्रांत का ज़िक्र करते हैं। जो मिथिलांचल के नाम से जाना जाता है। इस प्रांत के बारे में कहा जाता है कि प्राचीन काल से ही इसका अपना एक पहचान है। जिसका साक्ष्य रामायण में भी मिलता है। इसके बाद आधुनिक काल में तो इसकी विरासत कहानी बहुत लम्बी है। जिसका ज़िक्र पौराणिक काल से लेकर आधुनिक काल तक अलग अलग रूप में मिलता है। भारत की पहचान के कुछ समय बाद जब इस प्रदेश की पहचान की गई थी तो इसका एक हिस्सा भारत में और दूसरा हिस्सा भारत के पड़ोसी देश नेपाल में बताया गया।


इसके ऐतिहासिक किस्सों का ज़िक्र फ़िलहाल नहीं,बात वर्तमान और उससे कुछ पहले की।जब भारत अपनी आज़ादी के लिए प्रयासरत था तब से लेकर आज़ादी के 75 साल तक इस प्रांत ने भारत के पताका को लहराने का कार्य किया। लेकिन आज यह अपना अस्तित्व तलाश रहा है। खासकर कर आज़ादी के बाद। जो प्रांत प्रदेश का रोज़गार, उद्योग, कृषि, व्यापार, शिक्षा , चिकित्सा ,संस्कृति ,कला, साहित्य, आदि के साथ-साथ समाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं अन्य विकास की केंद्र थी आज उसकी पहचान खत्म हो गई है। कुल 38 जिलों में 22 जिले इस प्रांत में आते है। लगभग 12 करोड़ की आबादी वाले इस प्रदेश की लगभग 8 करोड़ आवादी इस प्रांत में रहती है। राज्य में सरकार निर्माण हो या केंद्र में इस प्रदेश का काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। सबसे ज्यादा पलायन की चुनौती इसी प्रांत की है। आदि और अन्य कई समस्या है जिसके समाधान के लिए यह प्रांत आज़ादी के 75 सालों से इंतजार कर रहा है। लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुयी है। और बिहार के इस प्रांत को राज्य और केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी का शिकार बनाया जा रहा है। जिसे बचने के लिए प्रांत अब विभाजन की माँग कर रही है। यहाँ के लोग ऐसा माँग कर रहे हैं कि जैसे झारखंड का विभाजन हुआ उसी प्रकार इस प्रांत का भी विभाजन किया जाय। ताकि य़ह प्रांत नयी तरीके से अपने विकास के आयामों को गढ़े और अपनी समस्याओं का समाधान कर अपनी पहचान कायम कर सके। 


लेकिन विभाजन के बाद की स्थिति के बारे में उसे पहले अपने से सीख लेनी चाहिए। क्योंकि अलग अलग काल मे विभाजन की मार सहने वाला यह प्रदेश अब किसी भी प्रकार के विभाजन की स्थिति में नहीं है। इसकी अपनी विरासतों में ही सेंध लगती रही है। क्योंकि इसकी वर्तमान स्थिति के लिए विभाजन एक प्रमुख कारण है। नतीजा यह हुआ है कि बिहार की हरेक चीज बदल चुकी है। जो किस्से इसके बारे मे मशहूर थी आज सिर्फ़ अफवाह बनकर रह गई है।हालांकि यह अपनी पहचान बदलने के लिए प्रयासरत है। मगर ये प्रयास अभी गिनती से दूर है। बिहार की इस हालात के लिए ज़िम्मेदार है यहाँ की राजनैतिक पार्टियां। जो कहने को तो खुद को बिहार के आम लोगों का मसीहा कहती हैं। मगर हक़ीक़त कुछ और है। आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद बिहार की तसवीर में काफ़ी अन्तर आ गया है। जिस बिहार की शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि का उदाहरण दिया जाता था आज उसकी उपलब्धि पिछली लाइन में खड़ी  होती है। जो बिहार कभी भारत के राजनीतिकरण का केंद्र था आज उसके नेताओं की गिनती भी नहीं होती है। ईमानदारी पर सवाल खड़े किए जाते हैं। तो यह कहना कि राजनीतिकरण, भाषाई विविधता, सामजिक भिन्नता, आदि के कारण हुयी किसी प्रांत या प्रदेश का विभाजन सही नहीं है। इससे विकास के कार्य ठप होते हैं। अतः इसलिए इसके लिए सही यही है की एक नागरिक के रूप समाजिक, राजनैतिक और आर्थिक समृद्धि के लिए ख़ुद प्रयास किया जाना चाहिए। इसमे अपनी भूमिका सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि एक सकरात्मक बदलाव की संभावना हो।

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संपादकीय विचार (Editorial Opinion)

केंद्र सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्ष में, इस बार 5 लोगों को भारतरत्न देने की घोषणा की हैं। केंद्र के इस घोषणा के बाद जहां विपक्...